पराली से कई गुना ज्यादा वायु प्रदूषण फैलाने वाले थर्मल पावर प्लांट, कब होगा समाधान
कुछ समय पहले, उत्तर भारत में वायु प्रदूषण की खबर दुनिया भर की सुर्खियों में थी। हवा इतनी जहरीली हो गई कि वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर 1,500 से ऊपर चला गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह असामान्य स्थिति थी, यहां तक कि उस क्षेत्र के लिए भी, जो दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में से एक है। हालांकि इस मौसम में पराली (फसल अवशेषों) जलाने को प्रदूषण का एक बड़ा कारण माना जाता रहा है, लेकिन थर्मल पावर प्लांट एक ऐसा स्थायी प्रदूषण स्रोत है, जो पराली से कई गुना ज्यादा प्रदूषण फैलाने के लिए जिम्मेदार है। पराली जलाने का समय, ठीक तभी आता है, जब तापमान में कमी आ रही होती है और हवाएं स्थिर होती हैं। इसके चलते सर्दियों में गंगा के मैदानों में बड़ी मात्रा में प्रदूषकों जमा हो जाते हैं। धुएं का यह गुबार ज्यादातर पीएम 2.5 कणों (बहुत महीन जहरीले प्रदूषक, जो ईंधन के दहन या बायोमास के जलने पर निकलते हैं) से बना होता है। लेकिन थर्मल पावर प्लांट से होने वाला प्रदूषण हमेशा बना रहता है। यह सालभर बड़ी मात्रा में प्रदूषण फैलाने के लिए जिम्मेदार है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की एक रिपोर्ट में पाया गया कि थर्मल पावर प्लांट पराली जलाने की तुलना में 10 गुना ज्यादा पीएम 2.5 और 200 गुना ज्यादा सल्फर डाइऑक्साइड (एक अन्य हानिकारक प्रदूषक है) छोड़ते हैं। अकेले एनसीआर में, थर्मल पावर प्लांट पराली जलाने की तुलना में 16 गुना ज्यादा सल्फर डाइऑक्साइड छोड़ रहे हैं। रिपोर्ट बताती है, “कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के उत्सर्जन के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव के बावजूद, इन पावर प्लांट पर सरकार का ज्यादा ध्यान नहीं है, जबकि पराली जलाने पर सख्ती कहीं अधिक है।” थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (एफजीडी) सिस्टम की जरूरत होती है, जो पीएम 2.5 के एक बड़े कारण सल्फर डाइऑक्साइड को फिल्टर करने का काम करता है। एफजीडी तकनीकों की कारगरता पर वैज्ञानिक सहमति और उन्हें लगाने के आदेशों के बावजूद सरकार का रवैया साफ नहीं है। सरकार की तरफ से एफजीडी को लागू करने के मामलों में अलग-अलग तरह की बाते सामने आ रही हैं। 19 नवंबर को ऊर्जा मंत्रालय ने थर्मल पावर प्लांट में एफजीडी सिस्टम लगाने की समय सीमा को बढ़ाने की मांग की। तो वहीं, नवंबर में ही सरकार के सबसे बड़े थिंक टैंक नीति आयोग ने सुझाव दिया कि थर्मल पावर प्लांट को एफजीडी लगाने की जरूरत नहीं है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट में औद्योगिक प्रदूषण की कार्यक्रम प्रबंधक श्रेया वर्मा ने कहा, “सबसे बड़ी समस्या यह है कि एफजीडी जरूरी है या नहीं, हितधारकों को इसकी समझ ही नहीं है। अगर एफजीडी की जरूरत पर ही सवाल उठाए जाएंगे, तो उद्योग भी इसे लेकर गंभीर नहीं होंगे और अनुपालन के मामले में ढिलाई बरतते रहेंगे।” दिल्ली एनसीआर के 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले पावर प्लांट्स के लिए एफजीडी लगाने की पिछली समय सीमा 31 दिसंबर, 2024 थी। लेकिन सीआरईए के विश्लेषण से पता चलता है कि, इस कैटेगरी में आने वाले चार पावर प्लांट्स में से केवल एक ने पूरी तरह से नियमों का पालन किया है, जबकि एक ने आंशिक रूप से इस पर काम किया।
