प्रदूषण पर पर्दा न डालें, सही जानकारी दें... एक्सपर्ट्स ने बताई दिल्ली पल्यूशन की पूरी कहानी
2017 में GRAP (ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान) लागू होने के साथ उम्मीद दिखी थी कि अब दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण कम करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। दिल्ली एनसीआर की सरकारों के बीच एक आयोग (CAQM) के बनने से तालमेल बढ़ेगा। एक्सपर्ट्स के अनुसार करीब आठ साल बाद भी प्रदूषण के नाम पर पाबंदियों और पड़ोसी राज्यों पर आरोप प्रत्यारोप अधिक देखने को मिल रहे हैं। हालांकि कई चीजों पर काम भी हुआ है और उसका असर भी देखने को मिला है। पंजाब व हरियाणा में पराली जलाने के मामले काफी कम हुए हैं। इलेक्ट्रिक बसें दिल्ली में बढ़ी हैं, डीजल बसों की दिल्ली में एंट्री कम हुई है। इसके बावजूद दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण के खिलाफ मुहिम का असर उतना नहीं है जितना होना चाहिए। मंजिल अब भी काफी दूर नजर आ रही है। पीएम 10 की बजाय पीएम 2.5 पर हो फोकस NCAP से तहत मिलने वाले बजट को सही दिशा में और सही तरीके से खर्च करना जरूरी है। सीएसई (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट) की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में NCAP (नैशनल क्लीन एयर प्रोग्राम) के तहत 2019-24 के दौरान मिले कुल बजट का महज 37 प्रतिशत ही खर्च किया गया। सीएसई की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुमिता रायचौधरी के अनुसार NCAP में पीएम 10 और पीएम 2.5 दोनों के लक्ष्य तय हैं। इसके बावजूद अधिक फोकस पीएम 10 पर किया जा रहा है। जबकि स्वास्थ्य पर सबसे अधिक असर पीएम 2.5 डाल रहा है।
