भारत की प्रदूषित नदियां दुनियाभर के लिए समस्या बनीं
भारत में दशकों से चले आ रहे खराब तरीके से कचरे के प्रबंधन के कारण कूड़े के बड़े-बड़े पहाड़ हर जगह दिखाई पड़ जाते हैं। लेकिन इस बढ़ते हुए ‘बिना उपचारित कचरे’ का परिणाम सिर्फ हम तक सीमित नहीं है। जलीय वातावरण में फैलते कचरे का अनुमान लगाने वाले एक नए अध्ययन से पता चलता है कि आने वाले समय में भारत इस वैश्विक समस्या के लिए कुछ बड़े जिम्मेदार देशों में से एक होगा और इसकी वजह शहरों यानी नगरपालिका क्षेत्रों का बिना उपचारित कचरा है। भारत में लाखों लोग अपने अस्तित्व के लिए विशाल नदी प्रणालियों पर निर्भर रहते आए हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के मुताबिक, भारत की नदियां दुनिया के अनोखे जलीय जीव-जंतु और पौधों की 18% आबादी का पोषण भी करती हैं। लेकिन 2022 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भारत की 605 नदियों में से आधे से थोड़ी ज्यादा नदियों को प्रदूषित पाया। यह प्रदूषण न सिर्फ लोगों के स्वास्थ्य और जैव विविधता के लिए खतरा है, बल्कि अब यह जल स्रोतों में जाने वाले कचरे के बढ़ते वैश्विक बोझ से भी जुड़ गया है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (IIASA) के शोधकर्ताओं ने एक नए अध्ययन में अनुमान लगाया कि 2020 में, भारत के नगरपालिका क्षेत्र के कचरे ने दुनिया की नदियों में बहकर जाने वाले कचरे में 10% का योगदान दिया है। और यह तब है, जब 2018 तक लागू नीतियों को ध्यान में रखा गया था। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट में रिसर्च एसोसिएट श्रोतिक बोस ने कहा, “यह कोई आश्चर्यजनक या असंभव आंकड़ा नहीं है। ऐसे कई अध्ययन हैं, जो भारत में कचरे के खराब प्रबंधन के बारे में बताते हैं।” सरकार ने अकेले गंगा नदी को साफ करने पर 13,000 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, लेकिन ये प्रयास काफी हद तक बेकार साबित हुए। 2019 के एक आकलन में क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया ने पाया कि गंगा के किनारे बसे 70% से ज्यादा शहर सीधे अपना कचरा नदी में डाल रहे थे क्योंकि उनके पास कचरे से निपटने वाले संयंत्र नहीं थे। बिना सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और कचरे के सही तरीके से प्रबंधन न होने के कारण 38,000 मिलियन लीटर से ज्यादा अपशिष्ट जल भारतीय नदियों में मिल रहा है।
