कचरे से ऊर्जा तक : हिमाचल के 7 स्कूल बने पर्यावरण की मिसाल, जीता ग्रीन अवार्ड
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के अनुसार वर्ष 2025-26 के राष्ट्रीय ग्रीन स्कूल्स प्रोग्राम ऑडिट में हिमाचल प्रदेश के 321 स्कूलों ने हिस्सा लिया था। इनमें से 35 स्कूल ग्रीन रेटिंग हासिल करने में सफल रहे। सीएसई के पर्यावरण शिक्षा इकाई के कार्यक्रम प्रबंधक नीरज कुमार का कहना है कि सम्मानित स्कूल यह दिखाते हैं कि पर्यावरण शिक्षा केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं, बल्कि व्यवहारिक बदलाव का माध्यम भी बन सकती है। स्कूलों को आमतौर पर पढ़ाई और परीक्षाओं के लिए जाना जाता है, लेकिन हिमाचल प्रदेश के सात स्कूलों ने यह साबित किया है कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होती। कहीं बच्चों ने कचरे को संसाधन में बदला, कहीं बारिश के पानी को सहेजने की पहल की गई और कहीं सौर ऊर्जा के जरिए ऊर्जा बचत का मॉडल तैयार किया गया। इन प्रयासों ने इन स्कूलों को पूरे प्रदेश में अलग पहचान दिलाई है। विश्व पर्यावरण दिवस पर शुक्रवार को राजधानी शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान में आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सात स्कूलों को मुख्यमंत्री ग्रीन स्कूल्स प्रोग्राम (जीएसपी) रोलिंग ट्रॉफी से सम्मानित किया। पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के बेहतर उपयोग के क्षेत्र में किए गए कार्यों के लिए इन स्कूलों को यह सम्मान मिला। इस अवसर पर चंबा जिले को भी प्रदेश का सर्वश्रेष्ठ ग्रीन जिला घोषित किया गया। जिले के स्कूलों ने ग्रीन स्कूल्स प्रोग्राम में सबसे अधिक भागीदारी दर्ज कराते हुए पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी सक्रियता का परिचय दिया। पुरस्कार प्राप्त करने वाले स्कूलों में चंबा का राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय चनेड़ विशेष रूप से चर्चा में रहा। स्कूल ने पहली बार ग्रीन स्कूल्स ऑडिट में हिस्सा लिया और पहली ही कोशिश में ग्रीन रेटिंग हासिल कर ‘न्यूकमर अवार्ड’ अपने नाम कर लिया। सोलन जिले के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय ओच्छघाट को ‘चेंजमेकर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। स्कूल ने लगातार प्रयासों और सुधारों के दम पर पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। सोलन के बी.एल. सेंट्रल पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल, कुनिहार को ‘एयर मैनेजर अवार्ड’ दिया गया। स्कूल ने प्राकृतिक रोशनी के अधिक उपयोग और पर्यावरण अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देकर ऊर्जा की बचत और बेहतर वातावरण बनाने की दिशा में काम किया। वहीं राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय प्रथा को ‘एनर्जी मैनेजर अवार्ड’ मिला। स्कूल ने सौर ऊर्जा के उपयोग और ऊर्जा संरक्षण को अपनी कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाया। कांगड़ा जिले का राजकीय प्राथमिक विद्यालय बांदोल भी सम्मानित स्कूलों में शामिल रहा। विद्यालय को ‘लैंड मैनेजर अवार्ड’ दिया गया। स्कूल ने हरित क्षेत्र बढ़ाने, पौधारोपण और जैव विविधता संरक्षण के जरिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। चंबा के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय होबार को जल संरक्षण के लिए ‘वाटर-वाइज अवार्ड’ मिला। स्कूल ने वर्षा जल संचयन और पानी के पुनः उपयोग जैसी पहलें अपनाईं। वहीं राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय खरगाट को ‘वेस्ट वॉरियर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। स्कूल ने कचरे के पृथक्करण, कम्पोस्टिंग और रीसाइक्लिंग के जरिए यह दिखाया कि कचरा भी8 संसाधन बन सकता है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने समारोह में कहा कि हिमाचल प्रदेश उत्तर भारत के “फेफड़ों” की तरह है और यहां के जंगल तथा नदियां देश के बड़े हिस्से की जीवनरेखा हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं माना जा सकता और इसमें हर नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने लोगों से अधिक पेड़ लगाने, पानी बचाने और प्लास्टिक के उपयोग को कम करने का आह्वान किया। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के अनुसार वर्ष 2025-26 के राष्ट्रीय ग्रीन स्कूल्स प्रोग्राम ऑडिट में हिमाचल प्रदेश के 321 स्कूलों ने हिस्सा लिया था। इनमें से 35 स्कूल ग्रीन रेटिंग हासिल करने में सफल रहे। सीएसई के पर्यावरण शिक्षा इकाई के कार्यक्रम प्रबंधक नीरज कुमार का कहना है कि सम्मानित स्कूल यह दिखाते हैं कि पर्यावरण शिक्षा केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं, बल्कि व्यवहारिक बदलाव का माध्यम भी बन सकती है। ग्रीन स्कूल्स प्रोग्राम के तहत स्कूलों का मूल्यांकन पानी, ऊर्जा, वायु, भूमि और कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में किया जाता है। जो स्कूल संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करते हैं, वर्षा जल संचयन अपनाते हैं, नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाते हैं, कचरे का पुनर्चक्रण करते हैं और विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करते हैं, उन्हें ग्रीन स्कूल की श्रेणी में रखा जाता है।
