केवल 5% कोयला बिजली संयंत्र मानदंडों को पूरा करते हैं: सीएसई
भारतीय संयंत्रों में सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन को लेकर सीएसई का विश्लेषण नई दिल्ली, एजेंसियां। कई बार समयावधि बढ़ाने के बावजूद भारत के कोयला से बिजली बनाने वाले संयंत्रों में से केवल पांच प्रतिशत ने ग्रिप गैस डी-सल्फराइजेशन (एफजीडी) प्रणाली स्थापित की है। यह सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए वायु प्रदूषण नियंत्रण का मानक उपकरण हैं। पर्यावरण पर काम करनेवाली संस्था- सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई)- का यह नया विश्लेषण अप्रैल में बिजली मंत्रालय की तकनीकी शाखा- केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) द्वारा जारी ताजा एफजीडी स्थिति पर आधारित है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने दिसंबर- 2015 में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के लिए उत्सर्जन मानदंड निर्दिष्ट किए थे। हालांकि, इन्हें विभिन्न मापदंडों के लिए शिथिल किया गया और समय-सीमा को बार-बार बढ़ाया गया है। सीएसई विश्लेषण के अनुसार, अब तक जिन पांच प्रतिशत संयंत्रों ने सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए एफजीडी स्थापित किए हैं, उनमें 9280 मेगावाट बिजली उत्पादन होता है। इनके बारे में बताया गया है कि उन्होंने एफजीडी चालू कर दिए हैं और अन्य 1430 मेगावाट उत्पादन करनेवाले संयंत्र एसओ2 के अनुरूप होने का दावा करते हैं। सीएसई की औद्योगिक प्रदूषण इकाई की कार्यक्रम अधिकारी अनुभा अग्रवाल ने कहा कि नियामक निकायों द्वारा जमीनी निरीक्षण के बारे में जानकारी की कमी इन दावों की सटीकता पर संदेह पैदा करती है। एफजीडी सिस्टम की स्थापना में लगभग दो साल लगते हैं और उसके बाद आवश्यक व्यवस्थाओं के लिए अस्थायी शटडाउन होता है। सीएसई शोधकर्ताओं ने उनके अनुपालन चरण और समय-सीमा तक शेष समय के आधार पर बिजली संयंत्रों द्वारा उत्सर्जन मानदंडों को पूरा करने की संभावना का अनुमान लगाया है। विश्लेषण से पता चलता कि दिल्ली-एनसीआर या 10 लाख या अधिक आबादी वाले शहरों (श्रेणी ए) के 10 किलोमीटर के दायरे में 2024 तक 43 प्रतिशत, गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों (श्रेणी बी) के 10 किलोमीटर के दायरे में 2025 तक 11 प्रतिशत और (श्रेणी सी) शहरों में 2026 तक एक प्रतिशत तक की क्षमता भी ताजा निर्धारित समय-सीमा तक पूरा करने की संभावना नहीं है। हालांकि, रिपोर्ट में पिछले मूल्यांकन की तुलना में थोड़ा सुधार देखा गया। इसका श्रेय समय सीमा विस्तार और क्षमता के संबंध में बढ़ी हुई स्पष्टता को दिया गया जो पहले सीईए की रिपोर्ट में नहीं आई थी। शोधकर्ताओं ने नई तय की गई क्षमता में से केवल 0.81 गीगावॉट को मानदंडों का अनुपालन करते हुए पाया, लगभग 13 गीगावॉट को समय-सीमा विस्तार के कारण अनुपालन करने की संभावना है। लगभग 23 गीगावॉट क्षमता एफजीडी व्यवहार्यता की खोज कर रही है और लगभग 2.47 गीगावॉट को डिकमीशनिंग के लिए पहचाना गया है। सीएसई रिपोर्ट ने बिजली उत्पादन कंपनियों के उदासीन दृष्टिकोण की भी आलोचना की है। इसमें देरी के लिए राष्ट्रीय बिजली योजना के औचित्य पर प्रकाश डाला गया। जैसे कि एफजीडी घटकों के लिए बाहरी बाजार पर निर्भरता, भारतीय बाजार में प्रौद्योगिकी की नवीनता और कोविड- 19 महामारी का प्रभाव आदि।
