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CSE Releases Compendium Of Success Stories On Water-Wastewater Management In Rural India

Book covers over 60 case studies from 30 districts in India “The Jal Jeevan Mission and the Swachh Bharat Mission are the ‘next generation reforms’ instituted by the country in water and sanitation. One of their objectives has been to ensure ‘functional’ tap water supply across the country. This is a significant aim, because it is an acknowledgement of the fact that water and sanitation management is not just about putting infrastructure like pipelines in place; it is about making the whole system sustainable. The question we need to ask ourselves is how successful have we been in meeting this objective that we have set for ourselves,” said Sunita Narain, director general, Centre for Science and Environment (CSE) on Wednesday. She was speaking at a national seminar organised by CSE to discuss some best practices from rural India in water, greywater and faecal sludge management. CSE’s latest publication on the subject, a compendium of case studies titled Big Change is Possible, was released on the occasion. The compendium records and celebrates the stories of over 60 villages and peri-urban locations from across India which offer successful case studies of systems that have worked – of ensuring sustainable supply of drinking water, greywater management, and faecal sludge treatment and management at the village level. CSE researchers travelled to 75 villages in 30 districts of the country to assess the big changes on the ground. Sustainability requires natural resources to be managed not through fractured bureaucracies but through decentralised systems of local community control. This is where the next big evolution in practice has to be—this is the experiment that will be the real game-changer Sunita Narain, director general, Centre for Science and Environment (CSE) From Sikkim, the book brings forth successful cases of rejuvenation and protection of springs for ensuring sustainable drinking water supply. Stories from coastal plains – Odisha and Andhra Pradesh – talk about ‘conjunctive’ use of groundwater and surface water. From Maharashtra come examples of greywater management, while Jharkhand and Chhattisgarh offer replicable case studies of treating and managing faecal sludge. Officially releasing the compendium, Vini Mahajan, secretary, department of drinking water and sanitation, Jal Shakti ministry, Government of India, echoed Narain’s sentiments and said: “The Indian government is working with partners – the civil society, local bodies, etc – to work together towards ensuring sustainable management of the resource. There is now an understanding of what is needed on the ground, and the government is acting on it. There is a deliberate emphasis on involving local and village communities in the effort.” Elaborating on some of the actions, Mahajan added: “The government has set up 2,000 local labs across the country to test and judge the quality of water. There is a proposal to train five women in every village in using field testing kits. There is also a proposal to set up ‘source finding committees’ whose task will be to assess the condition of the sources that are supplying water.” In her presentation, Narain said: “When we pollute water, we waste it. This is also why water supply has to be linked to the system of sanitation and wastewater generation. The fact is the toilet-building programme is incomplete unless the wastewater—the faecal sludge that is contained in the receptacle of the single- or double-pit or unlined, linked or honeycomb individual toilet—is safely disposed of. It must be treated so that it can be reused without polluting water or land.” According to Sushmita Sengupta, senior programme manager, Rural Water-Waste Management, CSE: “This seminar and book release, which was attended by stakeholders from across the country, has brought out the need for strengthening legal and institutional structures for effective implementation, and creation of a menu of technologies for rainwater harvesting, groundwater recharge and treatment of greywater and faecal sludge.” Putting in the last word, Narain said: “Sustainability requires natural resources to be managed not through fractured bureaucracies but through decentralised systems of local community control. This is where the next big evolution in practice has to be—this is the experiment that will be the real game-changer.”

दबाव में हिमाचल की पारिस्थितिकी, इस साल अप्रैल से जून तक रोज औसतन 31 बार लगी आग

हिमाचल प्रदेश में इस वर्ष एक अप्रैल से 30 जून तक जंगल में आग लगने की 2,763 घटनाएं सामने आई हैं। अगर राज्य के वन संरक्षण और अग्नि नियंत्रण विभाग के आंकड़ों की मानी जाए तो 2007 के बाद से यह सबसे अधिक है। आग को काबू पाने की कोशिश में तीन वन अधिकारियों की जान भी गई है। आग की इन घटनाओं की वजह से 23,000 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र प्रभावित हुआ, जिसमें हजारों हेक्टेयर नए पौधरोपण वाले क्षेत्र भी शामिल थे। वरिष्ठ वन अधिकारियों का कहना है कि शुष्क मौसम और मानवीय लापरवाही या जानबूझकर आग लगाने से घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। स्थानीय लोग इन घटनाओं के लिए बड़े पैमाने पर हो रहे निर्माण परियोजनाओं का नतीजा मानते हैं। बीते महीने हिमाचल के किन्नौर स्थित जंगी गांव के 66-वर्षीय किसान रोशन लाल जंगल की आग से परेशान रहे। गांव से सटे जंगल में बीते 12 जून को आग लग गई थी। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि उन्होंने इस स्तर पर आग पहले कभी नहीं देखा था। आग तीन किलोमीटर में फैली और सैकड़ों पेड़ों को अपनी चपेट में ले लिया। आग बुझाने में लगभग तीन दिन लगे लेकिन तब तक 2,000 बीघा (161 हेक्टेयर) से अधिक वन भूमि आग से प्रभावित हो चुकी थी। किन्नौर के डिविशनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) रेजिनाल्ड रॉयस्टन ने मोंगाबे-इंडिया को जानकारी दी कि धरातल पर तबाही साफ नजर आ रही है। उन्होंने कहा कि आग ने पारिस्थितिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण देवदार और कीमती लकड़ी के लिए मशहूर नीले देवदार के पेड़ों को प्रभावित किया। लाल ने कहा, “मेवा वाले सैकड़ों चिलगोजा देवदार के पेड़ इस आग की भेंट चढ़ गए। जंगी गांव के निवासियों के लिए ये पेड़ आजीविका के एक प्रमुख स्रोत हैं।” जंगी निवासियों के अनुसार प्रभावित क्षेत्र हिमालयी तहर ( जंगली बकरी से संबन्धित एक प्रजाति) और काले भालू का भी घर था। आग लगने का कारण इनके इंसानों वाले इलाके में आने का खतरा बना रहा। हालांकि, डीएफओ रेजिनाल्ड रॉयस्टन ने कहा कि चूंकि आग ऊंची पहाड़ी ढलानों पर लगी है और वहां कोई मानव निवास नहीं है। विभाग इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहा है कि आग की घटना आकस्मिक थी या जानबूझकर की गई थी। “लेकिन क्षेत्र में लंबे समय तक शुष्क मौसम को एक संभावित कारण माना जा रहा है। इसने जंगल में नमी के स्तर को काफी कम कर दिया है। इससे उन्हें तीव्र आग लगने का खतरा बढ़ जाता है,” रॉयस्टन ने आगे कहा। रिकॉर्ड तोड़ आग की घटनाएं हिमाचल प्रदेश में वन क्षेत्र राज्य के भौगोलिक क्षेत्र के 66 प्रतिशत हिस्से में मौजूद है। जैव विविधता के मामले में ये वन काफी समृद्ध हैं। साथ ही, ये वन नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हिमाचल प्रदेश में बढ़ती आग की घटनाएं अधिकारियों और नागरिकों के लिए चिंता का एक प्रमुख कारण है। ये वन राज्य के पर्यावरण, पारिस्थितिक और आर्थिक कल्याण के लिए महत्वपूर्ण हैं। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में जंगल में आग लगी। हिमाचल प्रदेश के वन संरक्षण और अग्नि नियंत्रण विभाग द्वारा मोंगाबे-इंडिया के साथ साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, राज्य में इस साल एक अप्रैल से 30 जून तक 2,763 आग की घटनाएं दर्ज की गईं। इस समय सामान्यतः जंगल में आग की घटनाएं बढ़ जाती है। इस दौरान यहां प्रति दिन औसतन 31 आग की घटनाएं हुईं। इस अवधि में 618 आग की घटनाओं के साथ धर्मशाला जिला शीर्ष पर रहा, इसके बाद चंबा (522), मंडी (364), शिमला (286), हमीरपुर (285), रामपुर (190), बिलासपुर (151) और सोलन (110) का स्थान रहा। संभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, 2007 में बिलासपुर में सबसे अधिक आग की घटनाएं सामने आईं। तुलनात्मक रूप से पिछले वर्षों में राज्य में अब तक दर्ज की गई 2,763 घटनाओं की तुलना में पूरे वर्ष में आग की घटनाएं कम रही हैं। वित्तीय वर्ष 2021-22 में 1,275 आग की घटनाएं सामने आईं। जबकि 2020-21 में 1,045 और 2019-20 में 1,445 आग लगी थी। अब तक एक वर्ष में सबसे अधिक जंगल की आग 2009-10 (1,906) और 2018-19 (2,544) में हुई थी। इन आग की घटनाओं में लगभग 23,239 हेक्टेयर वन क्षेत्र, जो कि राज्य के क्षेत्रफल का लगभग 0.45% है, प्रभावित हुआ है। आग के प्रभाव का कुल मूल्यांकन 64 करोड़ (640 मिलियन) रुपया किया गया है। कुल प्रभावित क्षेत्र में से 18,600 हेक्टेयर प्राकृतिक वन क्षेत्रों का हिस्सा था, और अन्य 4,500 हेक्टेयर में पौधरोपण था। इन पौधों को लगाने के लिए वन विभाग हर साल काफी खर्च करता है। जंगल की आग बुझाने के प्रयासों में तीन वन विभाग के कर्मियों की फील्ड ऑपरेशन के दौरान मौत हो गई। मिट्टी को प्रभावित करने वाली आग मोंगाबे-इंडिया से बात करते हुए वन संरक्षण और अग्नि नियंत्रण विभाग के मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) अनिल शर्मा ने कहा कि हिमाचल में जंगल की आग की ज्यादातर घटनाएं जमीन की आग की थीं। इसका मतलब आग जमीन से सटकर लगी और मिट्टी को भी प्रभावित किया। “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जंगल की आग को दो-तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है, जिसमें क्राउन फायर जो पेड़ों के शीर्ष से ​​फैलती है और पेड़ के सभी हिस्से को खा जाती है। यह सबसे तीव्र होती है और नियंत्रित करने में मुश्किल होती है। एक अन्य आग का प्रकार होता है-जमीन की आग। इसमें जंगल को नुकसान होता है, लेकिन यह ज्यादातर अपने ग्राउंड कवर को जला देता है और मिट्टी को प्रभावित करता है,” शर्मा ने समझाया। “इस साल के जंगल की आग में क्राउन फायर में आग लगने की घटनाएं बहुत सीमित थीं। यह ज्यादातर जमीनी आग थी। अच्छी बारिश के बाद आग से क्षतिग्रस्त जंगल के हरित आवरण के वापस सुधरने की संभावना है,” उन्होंने कहा। उन्होंने कहा कि राज्य का चीड़ का जंगल 1,259 किलोमीटर में फैला है और राज्य के कुल वन क्षेत्र का 3.4 प्रतिशत है। इस जंगल में आग की घटनाओं की अधिक आशंका रहती है। विभाग ने जंगल की आग की संवेदनशीलता के स्तर के अनुसार 2,026 बीट्स की पहचान की है, जिनमें से 339 बीट अत्यधिक संवेदनशील हैं। वर्षा की कमी, शुष्क मौसम और अन्य कारक सीसीएफ अनिल शर्मा ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि ज्यादातर मामलों में जंगल की आग मानवीय लापरवाही का परिणाम है। “उदाहरण के लिए, यदि कोई जलती हुई सिगरेट फेंकता है या यदि किसान वन क्षेत्रों से सटे अपने खेतों में आग लगाता है तो इससे वन क्षेत्र में आग लग सकती है। कुछ आग जानबूझकर भी लगाई गई थी, ताकि मानसून के बाद अच्छी गुणवत्ता वाली घास का चारा प्राप्त किया जा सके। शर्मा ने कहा, “लेकिन हिमाचल में इस मौसम में लंबे समय तक शुष्क रहने और सामान्य तापमान से अधिक तापमान से आग की संभावना बढ़ गयी है।” हिमाचल प्रदेश मौसम विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, राज्य में मार्च और अप्रैल के महीनों में क्रमशः 95 प्रतिशत और 90 प्रतिशत कम वर्षा देखी गई। मौसम विभाग के निदेशक सुरेंद्र पॉल के अनुसार 2002 के बाद से यह आंकड़ा सबसे अधिक है। मई और जून के महीनों में भी वर्षा की कमी क्रमशः 23% और 48% थी, जिसमें हिमालय के ऊपरी भाग में अभूतपूर्व वर्षा की कमी देखी गई थी। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के आधार पर दिल्ली स्थित गैर लाभकारी संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने हीटवेव के दिनों का आकलन किया। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 27 हीटवेव वाले दिन दर्ज किए गए, जो राजस्थान (39) और मध्य प्रदेश (38) के बाद देश में तीसरा सबसे अधिक है। किन्नौर में स्थित एक पर्यावरण कार्यकर्ता जिया लाल ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “हम सभी को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि पिछले एक दशक में राज्य में वर्षा और बर्फबारी के पैटर्न में भारी परिवर्तन क्यों है।” लाल ने कहा कि यह बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं का प्रत्यक्ष परिणाम है जिसने समग्र राज्य की पारिस्थितिकी को परेशान किया है। “इसके अलावा, वैश्विक और साथ ही अन्य घरेलू जलवायु परिवर्तन की घटनाएं हिमाचल में पहले की तुलना में अधिक बार सूखे की पुनरावृत्ति में मदद कर रही हैं। इससे वन संसाधनों, वन्यजीवों और पर्यावरण को भारी नुकसान होता है,” लाल ने कहा। जंगल की आग की घटनाओं को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है, इस पर सीसीएफ अनिल शर्मा ने कहा कि आग की सभी घटनाओं को रोकना असंभव है। इसके लिए सबको जागरूक होने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “हम स्थानीय लोगों, पंचायतों, स्कूली बच्चों के साथ बड़े पैमाने पर संपर्क कार्यक्रम आयोजित करते हैं, ताकि उन्हें जंगल की आग से वन संसाधनों, वन्यजीवों और पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक किया जा सके।” शर्मा ने कहा कि उन्होंने देहरादून में भारतीय वन सर्वेक्षण के साथ भी समझौता किया है, और उपग्रहों की मदद से वहां के अधिकारी राज्य के वन क्षेत्र के किसी भी हिस्से में धुआं उठने पर अलर्ट भेजते हैं। “यह हमें जल्द से जल्द मौके पर पहुंचने में मदद करता है और विभाग आग को रोकने के लिए हर संभव उपाय करता है,” उन्होंने कहा।

Organic takeover: How 10,000 farmers of Telangana, Andhra are steering a silent movement

Catering directly to the consumers' needs assures better marketability and incomes. This is what nearly 10,000 farmers of Telangana and Andhra Pradesh have realised over the past decade and are now steering a silent organic movement. It all began in 2009, when a group of consumers in Hyderabad, then part of unified Andhra Pradesh, established a cooperative society to source chemical-free produce directly from farmers. Operating under the guidance of the Centre for Sustainable Agriculture (CSA), a Hyderabad-based research non-profit, the cooperative society over a period of time roped in a few farmers and began to sell the produce through a farmer-run retail store in Secunderabad and mobile retail vans that travelled to urban areas. Soon, more and more organic farmers joined the cooperative society and what had started off as a consumers' initiative became a farmers' group. In 2013, when the government floated the concept of farmer producer organisation (FPO) to aggregate collection of produce and create market links for better prices under the Companies Act of 2013, CSA and the cooperative society saw this as an opportunity. Establishing an FPO also helps gain financial support from the government. Thus, in 2014, all the farmers' groups under the cooperative society registered themselves as organic FPOs, and the society at the helm as Sahaja Aharam Producer Company Limited, a unique "federation" of organic FPOs. That was the year when Telangana was carved out of Andhra Pradesh. But Sahaja Aharam continued its operation as a federation with FPOs from both the states. Today, as many as 23 organic FPOS with over 9,000 farmers across 180 villages are part the federation. The groups are spread over the southern plateau and hills of Andhra Pradesh, as well as the north, central and southern parts of Telangana. The farmers grow paddy, cereals, oilseeds, pulses, fruits, vegetables and spices. To obtain membership, FPOs buy equity in the federation. A board of five directors coordinates operations at the federation level along with the heads of the FPOs and support from CSA. Since inception, Sahaja Aharam has realised that there is a growing market for organic produce that can help farmers earn more. So it provides marketing and retail support for certified organic produce. Some of its member-FPOs, though, market both conventional and organic produce. The federation also encourages and helps farmers to obtain organic certification and trains them on cultivation of specific crops; weed, pest and disease management; and preparation of organic and biological inputs. Some farmers are also trained in poultry and livestock farming. Venkat Reddy from Kallem village in Jangaon district, Telangana, who has converted 1.2 hectares (ha) of his 6.07 ha farm to organic, said, "There was an initial loss in paddy yield after the shift, but the cost has reduced from Rs 25,000 per 0.4 ha to Rs 15,000. Currently, I grow organic paddy for my own consumption. But after seeing other farmers get 10-15 per cent more income from this variety, I plan to bring in more area under it." Regenerative or chemical-free cultivation has helped improve the local environmental conditions as well. Enabavi village in Telangana's Hanamkoda district, which declared itself as the first organic village in the region in 2006 is now entirely free of pesticides, fertilisers and genetically modified crops. All 52 farmer families of the village have shifted 110 ha to regenerative agriculture by composting organic waste, using cow dung manure and pest-trapping crops and harvesting water. "This has led to a rise in soil fertility," said GV Ramanjaneyulu, executive director of CSA. With more farmers trying to benefit from regenerative agriculture, the federation is focused on helping its members gain a better market share. For this, it plans production strategies with its FPOs. It apprises them of trends in organic produce, sales figures and rates from the previous years. "Unlike traditional FPOs, a lot of effort and business insight goes into production planning," said Prasanna T P, chief executive of Sahaja Aharam. Further, to ensure quality, the federation tests 1 per cent of total produce for chemical pesticide residue. "Sahaja Aharam buys my produce at 10-15 per cent higher price than the market," said Vekanna Reddy, a farmer from Mulang village, Siddipet district, Telangana. The federation buys cereals, millets, pulses, vegetables and oilseeds at 10 per cent higher prices, which can increase based on quality. For paddy, rates can go higher. The federation sells raw and processed products, which include food items, cosmetics and other non-food products. Some 45 per cent of the product range consists of organic fruits and vegetables. To set market prices, Sahaja Aharam follows two criteria. First, the farmers' share in the price must either be 50 per cent over the cost of cultivation, 12-15 per cent above the local market or 50 per cent of the average price in the previous year, whichever is highest. For instance, it procures paddy crop from farmers at Rs 42 per kg and sells it for Rs 80 - cultivators earn more than half the retail price. Farmers are paid in two tranches, once during procurement and then after sale of products. Second, to remain competitive, prices fixed by the federation are merely 15-20 per cent higher than those for conventional produce, but lower in comparison to those of some other organic players, particularly for pulses, groundnut oil and spices. Some 15 per cent of the price funds the federation's operations. For sales, the federation has expanded the retail stores. It now has two stores in Secunderabad and one each in Hyderabad and Visakhapatnam. Stores in Hyderabad and Secunderabad sell online as well. Their vans still operate in Hyderabad. Sahaja Aharam also sells unlabelled produce in bulk to 110 aggregators. Currently, 55 per cent of sales are to bulk aggregators, 43 per cent through retail stores and 2 per cent online. Turnover has increased multifold over the last few years, from Rs 90.3 lakh 2018-19 to some Rs 2.61 crore in 2021-22. The federation's efforts to increase farm incomes go beyond market access. "It has helped me re-learn sustainable farming techniques to increase yield. Earlier I used to earn Rs 29,600 per kg from paddy, now I earn Rs 33,000," Krishan, a farmer from Jeedikal village in Jangaon district, who practices organic farming in his entire 2.8 ha, said. "I can save 50 per cent of cultivation costs, around Rs 10,000, by using organic inputs that I make," he added. The federation encourages farmers to grow traditional and new crops, based on water requirement, pest resistance, yield and market preferences. It also enables knowledge exchange and peer learning. Further, it has introduced a mobile application called Pestoscope and set up surveillance centres in villages, and shares weather predictions from the India Meteorological Department and states. Sahaja Aharam also introduced an enterprise resource planning tool in 2018, developed by CSA, to manage production, finances, warehousing, sales and data analysis. To diversify incomes and provide more livelihood opportunities, the federation has set up "food hubs" at six districts in Andhra Pradesh and Telangana for storage and processing. It is also diversifying its product range to include ready-to-eat and non-food products. The federation provides several lessons on hand-holding support, storage, processing and marketing, however, like other FPOs in the country, it faces challenges such as poor financial support and lack of skilled humanpower. Addressing these hurdles will help it grow better. (This is the second in a series of multiple reports that show how better market access to non-chemical produce is key to the success of regenerative agriculture) This was first published in the 16-31 August edition of Down To Earth

Organic takeover

CATERING DIRECTLY to the consumers' needs assures better marketability and incomes. This is what nearly 10,000 farmers of Telangana and Andhra Pradesh have realised over the past decade and are now steering a silent organic movement. It all began in 2009, when a group of consumers in Hyderabad, then part of unified Andhra Pradesh, established a cooperative society to source chemical-free produce directly from farmers. Operating under the guidance of the Centre for Sustainable Agriculture (CSA), a Hyderabad-based research nonprofit, the cooperative society over a period of time roped in a few farmers and began to sell the produce through a farmer-run retail store in Secunderabad and mobile retail vans that travelled to urban areas. Soon, more and more organic farmers joined the cooperative society and what had started off as a consumers' initiative became a farmers' group. In 2013, when the government floated the concept of farmer producer organisation (FPO) to aggregate collection of produce and create market links for better prices under the Companies Act of 2013, CSA and the cooperative society saw this as an opportunity. Establishing an FPO also helps gain financial support from the government. Thus, in 2014, all the farmers' groups under the cooperative society registered themselves as organic FPOS, and the society at the helm as Sahaja Aharam Producer Company Limited, a unique "federation" of organic FPOS. That was the year when Telangana was carved out of Andhra Pradesh. But Sahaja Aharam continued its operation as a federation with FPOS from both the states. Today, as many as 23 organic FPOS with over 9,000 farmers across 180 villages are part the federation. The groups are spread over the southern plateau and hills of Andhra Pradesh, as well as the north, central and southern parts of Telangana. The farmers grow paddy, cereals, oilseeds, pulses, fruits, vegetables and

Coimbatore school wins ‘Changemaker’ award

PSGR Krishnammal Nursery and Primary School, Coimbatore, won the 'Changemaker' award of the Centre for Science and Environment (CSE) under the India’s greenest schools for 2021-22 category. The school was awarded for being a "school that monitors their resource consumption and improved them". Principal Dhanam Sivalingam, said, "We have been doing this Green School Program Audit since 2014. We have received so many awards for green practices from the US, School of Excellence for climate action, Grades of Green and Green Difference award." The award was given through an online ceremony on July 24. Of the 550 schools that took part, 110 bagged the ‘green’ tag. Programme manager of Environment Education at CSE, Tushita Rawat, said, “Green Schools Programme felicitates schools demonstrating positive and measurable environment changes like source-segregation, phasing out unclean fuels and inefficient lighting, and adopting renewables.”

Body calls for 30-minute slabs to fix parking rates in Delhi

Researchers from Center for Sustainable and Equitable Cities (C-SEC) said that these strategies aim to encourage on-street parking for short-term users New Delhi: Based on a case study of the on-street parking management around south Delhi’s Green Park Metro station area, the Center for Sustainable and Equitable Cities (C-SEC)-- an organisation working on integrated transport systems and public space design-- has argued for the overhaul of parking systems around mass rapid transit stations. The study, released on Wednesday, found that on-street parking is predominantly short term, with 51% car units parking for less than 30 minutes, while walking remains the main mode of access to the Metro station. While 70% of Metro users were found to walk to and from the station (first and last-mile connectivity), only 20% road space is allocated for pedestrian infrastructure. The C-SEC has also made several recommendations arguing for smaller parking periods ranging from 30-minute slabs, differential parking rates based on demand in an area, the bundling of various streets to parking contractors to reduce competition and re-investment of 25% of the parking revenue for the upgradation of transportation infrastructure in the neighbourhood. C-SEC has also proposed a new parking pricing structure based on data that shows a majority of drivers park for less than 30 minutes. “The fee should be charged for half hourly slots for first two hours and hourly thereafter. Roads should be categorised based on high demand (with more than 600 vehicles per day), low demand and arterial roads. Parking fees can be halved for electric vehicles,” the study said, adding that this will lead to an increase in revenue for the Municipal Corporation of Delhi (MCD) from the current ₹13 lakh per year to ₹3.45-6.05 lakh per day. Researchers said that these strategies aim to encourage on-street parking for short-term users (those who park for less than two hours) and nudge long-term users to shift to off-street parking locations and multilevel car parks. Sonal Shah, executive director of C-SEC, said they chose Delhi neighbourhood as a case study because the Capital has the largest Metro rail network and the highest number of vehicles per capita in India (643 vehicles per 1,000 residents). “The Metro rail achieved only 52% of its projected daily ridership in 2019-20 according to a Comptroller and Auditor General of India (CAG) report. Within this context, the Delhi government notified the Delhi Maintenance and Management of Parking Rules (DMMPR) in 2019 with the intent to organise parking in the city. Our study builds on the parking rules to use on-street parking management as a tool around mass rapid transit stations to improve walkability and encourage a shift towards public transport,” she said. The study found that walkability around the Metro station was not up to the mark--while 70% of the Metro users surveyed walked to and from the station, 80-90% of road space was occupied by vehicles. The remaining space did not offer a comfortable walking experience either, with poorly maintained footpaths that were encroached by parked vehicles. “Conversely, parking is very convenient for car and two-wheeler users, 87% of whom spend less than two minutes searching for on-street parking. Moreover, 74% of drivers reported walking less than 100 metres to their destination,” the report said. There is a 17-floor multilevel automatic car park in Green Park inaugurated by MCD in November 2020 which can accommodate 136 cars. The report said that while 82% cars were parked for less than two hours on the streets around the area, the nearby multi-level car parking facility only achieved an occupancy of 32%. “The Metro rail network in India covers around 753km, with cities such as Delhi and Bengaluru adopting transit-oriented development policies. Managing on-street parking around these stations could be the first step in implementing transit-oriented development in Indian cities,” Shah added. Meanwhile, experts said parking managements should adopt an area-based approach as compared to simply spot-fixing issues. “High levels of air pollution had instigated the need for parking interventions back in 2006,” Anumita Roy Chowdhury, executive director, Centre for Science and Environment, said. Nilesh Rajadhyaksha, an urban policy and planning expert from National Institute of Urban Affairs, also said that mapping public transport accessibility levels in the Master Plan of Delhi 2041 could achieve multiplier effects. “Integrating demand management measures with transport infrastructure can achieve multiplier effects--improve lagging public transport ridership, improve walkability and, most critically, air quality,” he said. Atul Goyal, president of United Residents Joint Action, a civil society initiative that connects 2,500 residents’ welfare associations in Delhi, emphasised the need to bridge the trust deficient between residents, citizens and the government for effective implementation of parking management plans. Shah emphasised that connecting the mass rapid transit and first and last-mile connectivity along with effective on-street parking management is critical to optimise investments and create better streets, and liveable and healthier cities.

Delhi’s garbage mountains will take 197 years to clear at current pace: Data

On average, 5,315 tonnes of garbage has been cleared every day in the past 34 months (1.94 million tonnes a year; the number is based on the average rate of work) New Delhi Delhi is sitting on 27.6 million tonnes of waste across three landfills, a marginal decline from the 28 million 34 months ago, when it embarked on an ambitious ₹250 crore programme to clear the landfills -- a statistic that raises questions about the Municipal Corporation of Delhi’s (MCD) ability to complete the task in the next 16 months, the latest deadline set by new lieutenant governor (LG) VK Saxena. Thi

दिल्ली: कूड़ों के पहाड़ों को साफ होने में लगेंगे अभी 197 साल, MCD ने बदला सफाई करने का तरीका

पिछले 34 महीनों में औसतन 5,315 टन कचरा हर दिन साफ किया गया है। इस हिसाब से हर साल 1.94 मिलियन टन कचरे की सफाई हुई है। साथ ही इन लैंडफिल साइटों में 4,931 टन कचरा हर दिन फेंका जाता है। पिछले 34 महीनों में दिल्ली के लैंडफिल साइट से 5.5 मिलियन टन कचरे को हटाया गया। वहीं इन्हीं 34 महीनों में 5.1 मिलियन टन नए कचरे दिल्ली के इन लैंडफिल साइटों पर फेंक दिए गए। दिल्ली का ओखला, भलस्वा और गाजीपुर लैंडफिल साइट कूड़ों का पहाड़ बनता जा रहा है। दिल्ली में कुल तीन लैंडफिल साइटें हैं। लैंडफिल साइट ऐसी जगह को कहते हैं जहां बड़ी मात्रा में शहर भर के कूड़े फेंके जाते हैं। कूड़ों के पहाड़ पर कुल 27.6 मिलियन टन कचरे दिल्ली के तीनों लैंडफिल साइटों पर कुल 27.6 मिलियन टन कचरे हैं। 34 महीने पहले यह 28 मिलियन टन थे। 34 महीनों में कचरों की सफाई में यह मामूली गिरावट है। कूड़े के पहाड़ को साफ करने में 197 साल लग जाएंगे पिछले 34 महीनों में औसतन 5,315 टन कचरा हर दिन साफ किया गया है। इस हिसाब से हर साल 1.94 मिलियन टन कचरे की सफाई हुई है। साथ ही इन लैंडफिल साइटों में 4,931 टन कचरा हर दिन फेंका जाता है। यानी हर साल 1.8 मिलियन टन कचरा पहाड़ों के आकार को और बड़ा कर देता है। इस तरह इन लैंडफिल साइटों को पूरी तरह साफ करने में 197 साल लग जाएंगे। अगर नए फेंके गए कचरे को नजरअंदाज करते हुए सिर्फ पुराने कचरों को ही साफ किया जाए तब भी कुल 14 साल लग जाएंगे। बढ़ा दिया गया बजट इन लैंडफिल साइटों की सफाई की परियोजना की लागत अब बढ़कर ₹1,864 करोड़ हो गई है। MCD के एक अधिकारी ने बताया कि मानसून के चलते इन कूड़ों के पहाड़ों के कचरे गीले हो जाते हैं। साथ ही गाजीपुर में इस साल के शुरूआती 6 महीनों में दोगुने से ज्यादा कूड़े फेंके गए हैं। इन्हीं कारणों से कचरे की सफाई करने में देरी हो रही है। गाजीपुर लैंडफिल साइट- दिल्ली का सबसे बड़ा कूड़े का पहाड़ केंद्र को सौंपे रिपोर्ट में यह बताया गया है कि गाजीपुर लैंडफिल दिल्ली के तीनों लैंडफिल साइटों में सबसे बड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार गाजीपुर लैंडफिल साइट पर सिर्फ पुराने कचरे की ही सफाई हो रही है। 2019 के जुलाई में इस लैंडफिल साइट पर 14 मिलियन टन कचरा था जो इस साल के मार्च में बढ़ कर 15 मिलियन टन हो गया। बढ़ाई जा रही है 'वेस्ट टू एनर्जी' प्लांट की क्षमता MCD ने कहा है कि कचरे की समस्या से निपटने के लिए निगम अपने 'वेस्ट टू एनर्जी' प्लांट की क्षमता में वृद्धि करने की कोशिश कर रहा है। MCD ने बताया कि तेहखंड में 2000 टीपीडी (टन प्रति दिन) क्षमता वाला एक वेस्ट टू एनर्जी प्लांट सितंबर 2022 तक चालू होने की संभावना है। साथ ही ओखला में मौजूदा वेस्ट टू एनर्जी प्लांट की क्षमता को 1,000 टीपीडी तक बढ़ाए जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। नरेला में एक नए वेस्ट टू एनर्जी प्लांट के लिए बोलियां आमंत्रित की गई हैं, जिसकी क्षमता 3,000 टीपीडी होगी। इन परियोजनाओं से ताजा कचरे को लैंडफिल साइट तक पहुंचने से रोकने में मदद मिलेगी और कचरा हटाने की दर में काफी वृद्धि होगी। जुलाई 2019 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा जारी किए गए मूल आदेश में कहा गया था कि पुराने कचरे के ढेर को "एक वर्ष के भीतर साफ किया जाना है, लेकिन छह महीने के भीतर पर्याप्त प्रगति की जानी चाहिए।"लेकिन कचरों की सफाई का यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका। MCD ने किए कई वादे दिसंबर 2020 में दिल्ली के तीनों निगमों ने कहा था कि मार्च 2021 तक तीनों लैंडफिल साइट के 50% पुराने कचरे साफ कर दिए जाएंगे। फरवरी 2021 में, निगमों ने नई समय सीमा जारी की और कहा कि भलस्वा में जून 2022, ओखला में मार्च 2023 और गाजीपुर में दिसंबर 2023 तक पुराने कचरों को साफ कर दिया जाएगा। MCD का नया वादा हालांकि इस साल मार्च में MCD ने आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय को बताया कि भलस्वा और ओखला साइटों को क्रमशः जुलाई और अक्टूबर 2023 तक साफ कर दिया जाएगा और गाजीपुर लैंडफिल साइट को दिसंबर 2024 तक समतल कर दिया जाएगा MCD का यह दावा संभव नहीं MCD की अगस्त में जारी रिपोर्ट के अनुसार पुराने कचरों में से 7.8% गाजीपुर में, 30% ओखला में, और 31.8% भलस्वा में साफ किया गया है। यह कुल मिलाकर 5.5 मिलियन टन है। लेकिन इसी दौरान गाजीपुर में 13 लाख टन, ओखला में 16 लाख टन और भलस्वा में 22 लाख टन ताजा कचरा जोड़ा गया है। नरेंद्र मोदी- शहरों को 'कचरे के पहाड़' से मुक्त करना होगा स्वच्छ भारत मिशन - शहरी 2.0 विशेष रूप से लैंडफिल साइटों की बात करता है। 10 जनवरी को कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुराने कचरे को साफ करने की जरूरत पर बात की थी। उन्होंने कहा था कि शहरों को "कचरे के पहाड़" से मुक्त करना होगा। उन्होंने इस दौरान गाजीपुर लैंडफिल का जिक्र भी किया था। गीला कूड़ा- एक समस्या सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट में वेस्ट मैनेजमेंट विशेषज्ञ अतिन विश्वास ने कहा कि गीले कचरे को बायोमाइन ( साफ ) करना मुश्किल है। दिल्ली में कचरों की सफाई सिर्फ 8-9 महीनों तक ही हो सकती है। उन्होंने कहा कि MCD ने कचरों की सफाई की जो समय सीमा दी है उसमे कचरे को साफ कर पाना असंभव है। वेस्ट टू एनर्जी प्लांट की क्षमता में वृद्धि करने पर भी यह संभव नहीं है। उन्होंने गीले और सूखे कूड़ों को अलग-अलग करने की बात पर जोर देते हुए कहा कि कूड़ों के आपस में मिल जाने से सफाई करने में समस्या आती है। MCD ने बदली नीति MCD अब तीनों लैंडफिल साइटों से 30-30 लाख टन कचरे को साफ करने के लिए किसी ठेकेदार को जिम्मेदारी देगी। परियोजना की देखरेख कर रहे स्वच्छता विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि निगम तीन लैंडफिल साइटों में से प्रत्येक पर बायोमाइनिंग कार्य के समग्र अनुबंध प्रदान करेगा। इससे पहले MCD कई छोटे ठेकेदारों को सफाई की जिम्मेदारी देती थी लेकिन अब MCD ने यह तय किया है कि एक बड़े ठेकेदार को तीनों लैंडफिल साइटों से 30-30 लाख टन कचरे को साफ करने की जिम्मेदारी दी जाएगी।

ग्राउंड रिपोर्टः एक गांव जिसमें चारे ने बदल दी किसानों की किस्मत, आज लगभग हर घर में ट्रक, कभी खाने की थी तंगी

कुछ व्यापार ऐसे हैं, जिनका जिक्र तो नहीं होता, लेकिन धीरे-धीरे वह इतना तरक्की कर जाते हैं कि उनसे होने वाला लाभ अन्य काम-धंधों से अधिक होता है। ऐसा ही एक व्यापार आज से 52 साल पहले भोपाल के ललरिया गांव के किसानों ने शुरू किया था। यह व्यापार है भूसे (चारे) का, जहां एक तरफ देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों को जानवरों को खिलाने के लिए चारा नहीं मिल पा रहा है। वहीं दूसरी ओर गांव के किसान चारे को दान में दे रहे हैं। 70 के दशक में शुरू किया व्यापार भोपाल के बैरसिया विधानसभा के ललरिया गांव के किसानों को 70 के दशक में ही एक ही बात समझ में आ गई थी कि सिर्फ किसानी से वह अपना पेट नहीं पाल पाएंगे। क्योंकि गांव वालों के पास जमीन तो बहुत थी। लेकिन उसकी सिंचाई के लिए कोई साधन नहीं था। गांव से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर नहर थी। साथ ही उस वक्त लोगों के पास बिजली भी नहीं थी न मोटर। गांव के किसान बारिश पर ही निर्भर रहते थे, जिसके कारण रबी की फसलें नहीं हो पाती थीं। इस परेशानी से निजात पाने के लिए गांव के किसानों ने भूसे का व्यापार करने का निर्णय लिया। गांव के वर्तमान सरपंच शाहिद खान के पिता और गांव के अन्य लोगों ने मिलकर खेती की समस्या से निवारण पाने के लिए भूसे का कारोबार शुरू किया। खान बताते है कि आवश्कता अविष्कार की जननी है। गांव के लोगों ने अपनी जीविका को चलाने के लिए एक और विकल्प खोज लिया, जिसका नतीजा यह है कि आज इस गांव के लगभग सभी लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस काम से जुड़े हैं। शाहिद खान और अन्य व्यापारी गांव में 1974 में आई बिजली शाहिद के ही बगल में बैठे एक बुजुर्ग बताते हैं कि जिस वक्त यह काम शुरू हुआ। गांव में बिजली नहीं होती थी। आज तो मशीनों के जरिए यह काम होता है, जिसके कारण काम जल्दी भी होता है और सप्लाई भी राज्य से बाहर की जाती। वह बताते हैं कि गांव में बिजली 1974 में आई। लेकिन यहां भूसे का काम 1970 में ही शुरू हो गया था। उस दौरान बुजुर्ग लोग गांव में खेतों से फसल की कटाई के बाद चारा लाते थे और दो बैलों की मदद से उसका भूसा बनाते थे। लेकिन आज के दौर में जैसे व्यापार बढ़ा इस गांव के आस-पास के गांव के खेतों से फसलों के सूखे पौधे(मुठे) को इकट्ठा करके मंगाया जाता है। उसे फैक्ट्री में भेजा जाता है। वह बताते हैं इस काम से छोटे किसानों ने भी इतनी तरक्की की है कि जो लोग पहले ट्रकों के खलासी बनकर इसकी डिलवरी करवाते थे। आज वह 10 चक्का ट्रक के मालिक हैं। बुर्जुग की बात को आगे बढ़ाते हुए शाहिद कहते हैं कि इस गांव की स्थिति आज ऐसी है कि 10 हजार की आबादी वाले इस गांव में लगभग 200 घरों में ट्रक हैं। जिसका नतीजा यह है कि अब किसानों को माल(चारा, भूसा) की डिलवरी करवाने के लिए किसी दूसरे पर आश्रित नहीं रहना पड़ता है। वह अपने पिता के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि एक समय ऐसा था यहां के छोटे किसानों के पास न तो सही से खाना होता था न ही कपड़े। ईद में अगर कोई ले लेता था तो धनी समझ जाता था। लेकिन हमारे बुर्जुगों ने अपनी सूझबूझ से ऐसा काम कर दिया है। जिससे आज हमारी पीढ़ी अच्छी जिंदगी जी रही हैं। चौम्पियन्स की होती है डबल इनकम इसी गांव के पूर्व जिला पंचायत सदस्य खालिद नेता से द मूकनायक की टीम ने इस पूरे व्यापार के बारे में जानने की कोशिश की। खालिद बताते हैं कि इस व्यापार की शुरुआत के बारे में तो आपको पता चल गया है। चार पैक करते चैंपियन आज की बात करें तो स्थिति यह है कि इस गांव को छोटा हो या बड़ा हर किसान इस धंधे से जुड़ा हुआ है, जिनके पास खेती की जमीन नहीं है। वह यहां मजदूरी करते हैं। स्थिति यह है अब इस गांव के आस-पास के जिलों से लोग काम करने आते हैं। जिनकी मजदूरी 500 रुपए होती है। वहीं दूसरी लोग जो लोग भूसे(चारा) को ट्रकों और लोरी में भरते हैं। वह अलग मजदूर होते हैं। उनकी दिहाड़ी नहीं होती है। उन्हें प्रति गाड़ी की भराई के हिसाब से मजदूरी मिलती है। इन्हें “चौम्पियन” कहा जाता है। जिन्हें एक ट्रक की भरपाई में 1200 मिलता है। ऐसे कई चौम्पियन्स हैं। जो दिनभर में दो से तीन ट्रक भर लेते हैं। वह बताते हैं कि चौम्पियन को मजदूरी नहीं मिलती यह उनके टैलेंट की कमाई है क्योंकि हर कोई ट्रक को भर नहीं सकता है। भूसे की कमी आधुनिकता ने हमें बहुत कुछ दिया तो प्रकृति हमसे बहुत कुछ छीन रही है। यह कहना है खालिद नेताजी का। वह बताते हैं कि शुरुआती दिनों में लोग मजदूरी करते थे। आज मशीनीकरण के दौर में यह काम मशीनें कर रही हैं, जिससे काम तो जल्दी हो जाता है। हालांकि एक समय बाद उसका परिणाम भी भुगतना पड़ता है। वह बताते हैं कि पहले के दौर में लोग दाती(फसल काटने वाले औजार) फसले के मुठे को काटते थे। जिसके कारण पौधा पूरी तरह से कट जाता था और उससे पौधे की लंबाई भी ज्यादा होती है। पौधे की लंबाई ज्यादा होती थी। इसलिए भूसा भी ज्यादा होता था। आज के दौर में हमलोग कंबाइन हॉरवेस्टिंग मशीन से फसलों की कटाई कराते हैं। मशीनों से कटाई होने के कारण मुठा पूरी तरह से जमीन से कट नहीं पाता है। मशीन एक दो सेंटीमीटर ऊपर से काटती है। जिसके कारण भूसे में कमी आ रही है। जिसका परिणाम हमें इस साल देखने को भी मिला है। देश के अलग-अलग हिस्सों में चारे की कमी आ गई है। आज हालात ऐसे हैं कि चारे की कमी के कारण लोग पशुओं को पाल नहीं पा रहे हैं। वह कहते हैं कि जिस तरह से इस साल चारे की कमी के खबरें आ रही थीं। वह भविष्य के संकट के संकेत हैं। सिर्फ एक सीजन का ही काम है जिस वक्त भूसे का यह काम शुरू किया गया था किसी ने नहीं सोचा था कि यह इतना बड़ा व्यापार बना जाएगा। खालिद बताते हैं कि यह एक तरह का सीजनल काम है। जिसकी अवधि मार्च से जून तक की होती है। रबी की फसल (गेंहू, चना, मक्का) की कटाई के दौरान यह काम होता है। इन तीन महीनों में ही किसान अपना व्यापार करते हैं। जबकि बड़े किसान पूरा साल भर का माल भरकर रख लेते हैं और साल भर बेचते है। इसी दौरान गांव के आस-पास के 10 से 15 जिलों से फसलों के मुठों को इकट्ठा किया जाता है। इसके लिए भी ंएक आदमी होता है। वह गांव-गांव जाकर लोगों से पूछता है किसे बेचना है। जैसे ही लोग राजी हो जाते हैं और पैसों को बात फाइनल हो जाती है। एक ट्रक में उसे लाया जाता है और फैक्ट्री में रखा जाता है। खालिद बताते है कि जिस वक्त यह काम शुरू हुआ था। उस वक्त भूसे की कीमत 12 रुपए क्विंटल थी। आज इसकी कीमत 1200 रुपए क्विंटल हो गई है। इसके साथ ही महंगाई भी बढ़ी है। लेकिन इतना है कि लोग खुशहाली की जिंदगी जी रहे हैं। कैसे होता है व्यापार शाहिद के परिवार की यह दूसरी पीढ़ी है। जो इस व्यापार को कर रही है। वह बताते हैं कि इतना आसान नहीं है काम करना। एक भूसे के ट्रक में माल लादने से लेकर गंतव्य स्थान तक पहुंचाने में कई तरह की दिक्कत आती है। शाहिद कहते हैं कि आज देश के अलग-अलग हिस्सों में भूसा हमारे यहां से ही जाता है। गोवा, मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र। वह बताते हैं कि एक ट्रक में 1500 क्विंटल चारा भेजा जाता है। जिसे भेजने की एक लंबी प्रक्रिया है। इन्हें दो तरीकों से भेजा जाता है। पहला आप डायरेक्ट अपने क्लाइट को संपर्क करें। जहां आपका माल हमेशा जाता है। यहां भेजने में दिक्कत नहीं होती है। दूसरा आढ़तियों के माध्यम से। वह बताते हैं कि आढ़ती हमें क्लाइट देता है और हम उसे इसके बदले पैसे देते हैं। इनसे जबतक पूरी बात फाइनल नहीं हो जाती है तब तक ट्रक भेजा नहीं जाता है। वह बताते इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि चारे की कोई मंडी नहीं है। जिसे चाहिए वह आपसे सीधा संपर्क करेगा। इंदौर और पूने सबसे ज्यादा चारा भेजा जाता है वैसे तो भूसे का व्यापार पूरे देश में ललरिया गांव से होता है। लेकिन सबसे ज्यादा डिलवरी इंदौर और पूने में होती है। पूने में मशरूम की खेती के लिए इसका प्रयोग किया जाता है और इंदौर में डेयरी का काम किया जाता है। खालिद बताते हैं कि एक ट्रक के पीछे लगभग 20 से 25 हजार का मुनाफा हो जाता है। ट्रक को भरने से लेकर वहां पहुंचाकर वापस आने में एक सप्ताह का समय लग जाता है। मुनाफे की बात करते हुए वह कहते हैं कि यह मुनाफा इसलिए भी होता है क्योंकि सभी व्यापारियों के पास लगभग अपने ट्रक हैं। जिसके कारण वह वापसी के समय वह से कुछ और लोड करके ले आते हैं। वह कहते है कि इस व्यापार की एक और खासियत है। ट्रक में भूसा जो चौम्पिंयन भरते हैं। खाली करने भी वही लोग जाते हैं। क्योंकि उसे भरने और खाली करना भी एक तकनीक है। जिसे हर कोई नही कर सकता है। व्यापार में आती चुनौतियां शाहिद कहते हैं कि बाकी व्यापारों की तरह इसमें भी तरह-तरह की चुनौतियां हैं। हमारी लिए सबसे बड़ी चुनौती आग है। कई बार ऐसा होता है कि ट्रक में आग लग गई। सूखा चारा होने के कारण इसमें आग बहुत जल्दी पकड़ लेती है। कई बार उसमें लोग भी जल जाते हैं। कई लोगों को एक झटके में ही पूरा धंधा ही खत्म हो जाता है। दूसरा कई बार ऐसा होता है बड़े व्यापारी भूसे को स्टॉक करके रख लेते हैं। लेकिन मांग नहीं आने के कारण वह पूरी से सड़ जाता है। जिसका भारी नुकसान झेलना पड़ता है। सफल किया अपना बिजनेस मकसूद मौलान ललरिया गांव के ही रहने वाले एक मध्यम वर्गीय किसान है। जिनके पास 21 एकड़ जमीन है। सात साल पहले मकसूद से चारे का कारोबार शुरू किया था। आज उनका कारोबार दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। वह बताते हैं कि 1500 क्विंटल में लगभग 15 से 20 हजार का मुनाफा कमा लेते हैं। 850 से लेकर 1200 रुपए तक प्रति क्विंटल बेचते हैं। उनका काम पूरे 12 महीने चलता है। गांव की संरचना ललरिया गांव एक मुस्लिम बहुत गांव हैं। जहां 80 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। जिसमें 1500 परिवार है। लगभग 50 बड़े किसान है। जिनके पास 50 से 100 एकड़ तक की जमीन है। मध्यम वर्ग के 100 किसान है। जिनके पास 20 से 50 एकड़ तक की जमीन है। बाकी बचे 40 प्रतिशत छोटे किसान हैं। पूरे गांव में लोगों के पास खेती बाड़ी के साथ-साथ मवेशी भी है। गांव के लोग अपनी जरूरत का चारा रखकर बाकी बेच देते हैं। नोट : सेंटर फॉर साइंस एण्ड इनवायरमेंट द्वारा देशभर में कई पत्रकारों को भोपाल के आस-पास के गांवों का दौरा करवाया गया ताकि जमीनी सच्चाई को जान सकें।

मध्यप्रदेशः महंगे भूसे और हरे चारे की कमी के चलते सड़क पर मवेशी छोड़ने को मजबूर किसान

एक गाय पालने में प्रतिमाह 1500 रुपये ख़र्च बैठता है। हरा चारा नहीं मिलता जिसके चलते किसानों को 40 रुपये प्रति किलो भूसा ख़रीदना पड़ता है। ऐसे में शिवराज सरकार की तरफ से गाय पालने के लिए 900 रुपये की प्रोत्साहन राशि बेहद कम है। मध्य प्रदेश में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए देशी गाय पालने वाले किसानों को शिवराज सरकार 900 रुपए प्रतिमाह देने की घोषणा की है। बावजूद इसके किसान बिना दूध वाली गाय-भैंस रखने को तैयार नहीं है। सरकार द्वारा तैयार किए गए अध्यादेश में कहा गया है कि अगर कोई जानबूझकर सार्वजनिक स्थान पर पशु छोड़ता है और इससे किसी व्यक्ति, संपत्ति को नुकसान व ट्रैफिक में बाधा पहुंचती है तो 5 हजार रुपये तक जुर्माना वसूला जाएगा। इसके बावजूद ज्यादातर सड़कों पर गाय का कब्जा है। मौजूदा समय में सड़कों पर गाय का झुंड बड़ी समस्या बन चुकी है। आखिर गायों को घर से निकालने के लिए क्यों मजबूर हो रहे हैं किसान! इसकी पड़ताल के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 55 किलोमीटर दूर बैरसिया तहसील के अंतर्गत ललरिया गांव मैं पहुंची। इस गांव को भूसा हब के नाम से भी जाना जाता है। यहां से पूरे देश में भूसे की आपूर्ति की जाती है। दिलचस्प बात यह है कि किसान अपने पशुओं के लिए भूसे का इंतजाम न करते हुए पूरे देश में इसे ऊंचे दामों में बेच रहे हैं। पड़ताल के दौरान किसानों ने बताया कि भूसा की बिक्री मुनाफे का धंधा है। ललरिया के आस-पास के करीब 30 गांव के किसान यही सोचते हैं और सभी इसी धंधे में लगे हैं। यहां 1400 रुपए कुंतल तक भूसा बिक जाता हैं और यहां से ट्रकों पर लदकर भूसा देश के अलग-अलग हिस्सों में मांग के अनुसार बे रोक-टोक भेजा जाता है। मवेशी पालने का ख़र्च पहुंच से बाहर इसी गांव के प्रकाश ठाकुर के पास 6 भैंस थीं, जिसे उन्होंने पिछले एक साल में एक-एक करके बेच दी। सिर्फ एक भैस अपने परिवार के दूध, घी के लिए बचाकर रखा है। इसी तरह रामबाई के पास 4 गायें थी, जिसे उन्होंने सड़क पर छोड़ दी। रामबाई बताती हैं कि गाय दूध देना बंद कर दे तो उसे कोई नहीं खरीदता। गाय के पोषण के लिए चारा और भूसा चाहिए। जो अब बहुत महंगा हो चुका है और हमारे पहुंच से बाहर है। ललरिया के ही मुस्ताक भाई के पास 5 गायें थीं। अब केवल एक है, बाकी उन्होंने भी सड़क पर छोड़ दी। विनोद ठाकुर के पास 5 भैंस थी, अब केवल 2 है, बाकी उन्होंने अपनी खरीदी हुई रकम से 75 फीसदी कम कीमत में बेच दी। इन सभी पशुपालकों ने चारा और भूसे की महंगाई को इसका कारण बताया। एक गाय को पालने के लिए प्रतिमाह 1500 रुपए खर्च बैठता है। चरनोई की जमीन है नहीं। सरकार ने अधिकतर जमीन पूंजीपतियों को या फिर पट्टे में दे दी। रही सही लोगों ने कब्जा कर लिया। इसलिए हरा चारा तो मिलता नहीं। 40 रुपए प्रति किलो भूसा खरीदना पड़ता है। एक गाय के खुराक के लिए प्रतिदिन 5 किलो भूसा और 25 रुपए की अन्य चीजें लगती हैं। अब महीने भर का हिसाब लगा लीजिए। ऐसे में शिवराज सरकार का 900 रुपए कहां ठहरता है और वह भी केवल देसी गाय के लिए। इसी गांव के सबसे बड़े भूसा व्यापारी एक्का सेठ बताते हैं कि दरअसल यहां भूसे के कारोबार में ग्रामीणों को मजदूरी भरपूर मिल जाती है। उन्होंने कहा कि 1970 के दशक में उनके पिता ने बहुत छोटे स्तर पर भूसे का कारोबार शुरू किया था। उस वक्त यहां से सिर्फ इंदौर तक ही भूसा भेजा जाता था जो गत्ता बनाने के व्यवसाय में उपयोग किया जाता था। धीरे-धीरे इसका व्यावसायिक उपयोग बढ़ता गया। महाराष्ट्र में मशरूम उगाने के लिए भूसे का उपयोग होने लगा। इसके अलावा पशुओं के लिए भी किसान भूसे की मांग करते हैं। साथ ही गत्ता बनाने में ईंधन के लिए भी भूसे की मांग बढ़ी है। मांग बढ़ी तो दाम भी बढ़ गए। इस तरह आस-पास के सभी गांव के किसान भूसे का व्यवसाय करने लगे। इसका एक चेन बना है। जहां आढ़ती भूसे का आर्डर देते हैं। वहां से भूसे की आपूर्ति का ऑर्डर मिलता है। फिर किसानों के दरवाजे से भूसे की तौलाई कर गोदाम में लाया जाता है। इसके बाद ट्रक पर लादकर उसे भेजा जाता है। उन्होंने कहा एक ट्रक में 150 कुंतल भूसा भरा जाता है, इसके लिए काफी मजदूरों की जरूरत पड़ती है, यहां से एक सीजन में प्रतिदिन 200 ट्रक निकलती है, जिसके लिए मजदूरों की जरूरत पड़ती है, उन्हें प्रतिदिन 500 रुपए मजदूरी मिलती है। इसलिए यहां पलायन भी नहीं है। सभी को काम मिल जाता है। यहां आस-पास के 30 गांव के किसान अपना भूसा 400 रुपए प्रति एकड़ बेचने आते हैं, इसी तरह मजदूर भी यहां काम मांगने आते हैं और कोई खाली हाथ नहीं जाता। यहां तक कि दिव्यांग को भी यहां काम मिल जाता है। उन्होंने कहा पहले पशुधन और जमीन से लोगों की प्रतिष्ठा आंकी जाती थी, अब नजरिया बदला है और दरवाजे पर खड़ी लग्जरी गाड़ी देखकर लोग प्रतिष्ठा का अनुमान लगाते हैं। लिहाजा यहां घरों के दरवाजे पर गाय नहीं, बल्कि लग्जरी गाड़ियां दिख जाएंगी और वह भी भूसे की कमाई से ही है। रबी और खरीफ के अलावा जायद फसल में भी भूसे का धंधा खूब चलता है। बरसात में बड़े करीने से उसे तिरपाल से ढक कर रखा जाता है। एक्का सेठ ने यह भी बताया कि मशीनीकरण ने भी जानवरों को नुकसान पहुंचाया है। जिसके चलते 70 फीसदी लोगों ने जानवरों को सड़कों पर छोड़ दिया है, जिनकी जान प्रायः सड़क दुर्घटना में चली जाती है। ललरिया के सरपंच बल्लू बताते हैं कि सबसे ज्यादा भूसा गेहूं की कटाई के बाद निकलता है। इसके बाद सरसों, मसूर धान जैसे फसलों से भी भूसा मिल जाता है। सरसों का भूसा मवेशी नहीं खाते इसलिए इसका तो व्यावसायिक उपयोग किया जा सकता है। जानवरों के लिए क्यों आया भूसे का संकट उत्तर प्रदेश के झांसी स्थित भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान के क्रॉप प्रोडक्शन डिवीजन के प्रमुख सुनील तिवारी बताते हैं कि मशीनीकरण का उपयोग, खेती का विविधीकरण और हीट स्ट्रेस (फसलों की वहन क्षमता से अधिक गर्मी) मौजूदा चारे के कमी के मुख्य कारण है। इसके अलावा कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई से भूसा कम निकल रहा है। जिसके कारण जानवरों के लिए चारा कम पड़ रहा है। भूसे का परिवहन रोकना समस्या का हल नहीं केवल भूसे का परिवहन इसकी समस्या नहीं है, क्योंकि बहुत सारे राज्यों में पशुओं के लिए चारा मांग के अनुपात में बहुत कम है। वहां तो भूसे की आपूर्ति होनी है लेकिन इसके व्यावसायिक उपयोग को रोका जाना चाहिए। एक बुजुर्ग व्यक्ति मौलाना मसूद खान बताते हैं कि 1975 तक 4-7 गाड़ी भूसा ही यहां से निकलता था लेकिन अब प्रतिदिन 200 ट्रक निकलता है। आज भी 80 फीसदी चारा पशुओं के लिए ही जाता है। शेष 20 फीसदी व्यावसायिक उपयोग के लिए। वाराणसी स्थित उदय प्रताप महाविद्यालय के सस्यविज्ञान (एग्रोनोमी) विभाग के सहायक प्राध्यापक देव नारायण सिंह बताते हैं कि सरकारी नीतियों के कारण पिछले एक साल में गेहूं के भूसे और धान की पुआल की कीमतों में दो से तीन गुना वृद्धि हुई है। तात्कालिक कारणों को देखें तो जलवायु परिवर्तन के कारण गेहूं का रकबा घटा है। इसके अलावा भूमिगत जल स्तर से महंगी होती सिंचाई, बढ़ती लागत के कारण किसानों का कम लागत व कम पानी वाली फसलों जैसे चना व सरसों की तरफ आकर्षित होना है। इनमें भूसे की मात्रा बहुत कम होती हैं। ऐसी स्थिति में लोग जानवर पाले तो कैसे। वैसे भी सरकार सिर्फ देसी गाय के लिए 900 रुपए प्रति माह देने की बात कर रही है बाकी जानवरों की चिंता भी सरकार को करनी चाहिए।

पानी की कमी से जूझ रहा यह गांव देशभर में भेजता है लगभग 400 गाड़ियां भूसा

ललरिया गांव से आज के समय देशभर में अलग-अलग जगहों पर 400 गाड़ियों से भूसे या सूखे चारे की सप्लाई की जाती है। यहां के किसानों ने इस तरह से अपनी रोजी-रोटी के संकट को दूर कर लिया है। भोपाल से लगभग 60 किलोमीटर दूर बैरसिया तहसील का नाम इनदिनों काफी सुर्खियों में रहा जब ऐसी खबरें आईं कि यहां के गौशाला में चारे की कमी के कारण कई गौवंशों की असमय मौत हो गई। इसे लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी काफी लगाए गए। वहीं, इसी तहसील का एक गांव ललरिया बीते 50-52 सालों से मध्यप्रदेश व देश के कई राज्यों में चारे की आपूर्ति कर रहा है और इसी के बल पर यह गांव काफी विकसित हो चुका है। यहां आने के बाद जब इसकी गलियों में घूमने पर यह गांव नहीं लगकर एक छोटा कस्बा जैसा महसूस होता है। इस गांव की समृद्धि का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यहां लगभग 200 ट्रक-ट्रैक्टर जैसी गाड़ियां हैं। लगभग 10 हजार की आबादी वाले इस गांव ने खेती-किसानी से थोड़ा सा इतर काम किया और पशुपालन में सबसे ज्यादा आवश्यक पशुओं के चारे को अपना मुख्य व्यवसाय ही बना लिया है। chara loading ललरिया गांव बीती सदी के 70 के दशक से जलवायु परिवर्तन से जूझ रहा है और पानी की कमी ने यहां के किसानों को विकास के रास्ते पर काफी पीछे की तरफ धकेल दिया। यहां के किसानों के सामने अपनी जमीन बचाने या पेट पालने का संकट खड़ा हुआ तो उन्होंने पशुओं के भोजन में इस्तेमाल होने वाला चारा उगाना शुरू कर दिया और उसके बाद तो इस गांव का लगभग कायाकल्प सा हो गया। आज के समय में इस गांव में आसपास के तकरीबन 40 से 50 गांवों के किसान अपना भूसा यहां आकर चारा का कारोबार करने वाले किसानों या कारोबारियों को लाकर बेचते हैं, जिससे उन्हें अच्छी-खासी आमदनी हो जाती है। ललरिया गांव से आज के समय देशभर में अलग-अलग जगहों पर 400 गाड़ियों से भूसे या सूखे चारे की सप्लाई की जाती है। यहां के किसानों ने इस तरह से अपनी रोजी-रोटी के संकट को दूर कर लिया है। chara lalaria ललरिया गांव के नवनिर्वाचित सरपंच मोहम्मद शाहिद खान बबलू बताते हैं कि गांव के लोगों को मजबूरी ने सिस्टन बनाने पर मजबूर किया। पहले जहां हर चीज का अभाव नजर आता था, वहीं अब हालात बदल गए हैं। यहां के किसान खेती-किसानी भी करते हैं, मजदूरी भी करते हैं और साथ ही चारे का कारोबार भी। यहां भूसे को गाड़ी में भरने के लिए एक मजदूर को 500 रुपये प्रति गाड़ी दिया जाता है और आमतौर पर एक गाड़ी को भरने में चार-पांच मजदूर लगते हैं। हालांकि, मौसम की अनिश्चितता, पानी की कमी व किसानों द्वारा हार्वेस्टिंग मशीन के इस्तेमाल की वजह से चारे के उत्पादन में लगातार कमी आ रही है। इसके कारण एक ओर जहां भूसे के दाम बढ़ रहे हैं तो पशुओं के चारे में भी कमी आ रही है। वे आगे कहते हैं कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में जिस चारे की वजह से गांव में समृद्धि आई है वो उनके सामने गंभीर संकट भी ला सकती है। इसके लिए जरूरी है कि सरकार इस पर ध्यान दे और धान व गेहूं की तरह चारे का भी एमएसपी तय कर दे ताकि किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिल सके और वे इसके उत्पादन के लिए प्रेरित हों। इसके साथ ही वे कहते हैं कि सरकार को चारा क्रय-विक्रय के लिए एक सिस्टम बनाना चाहिए जिससे कारोबारियों को सहूलियत हो और उनका कारोबार अच्छी तरह से चल सके। पूर्व सरपंच जिन्हें गांव के लोग प्यार से कप्तान कहते हैं, ने बताया कि गांव में सालाना तकरीबन 40 लाख रुपये का भूसे का कारोबार होता है जिससे आसपास के गांवों के किसानों-मजदूरों की रोजी-रोटी चलती है। हालांकि, गांव में और कई तरह की समस्याएं तो बनी हुईं हैं लेकिन उनके निदान के लिए लगातार काम किया जा रहा है। गांव वाले बताते हैं कि जब पास के ही बैरसिया गांव की गौशाला में चारे की कमी से कई गौवंश ने दम तोड़ दिया था, तब ललरिया गांव के लोगों ने एकसाथ मिलकर आठ क्विंटल चारा वहां के गौशाला को निःशुल्क दिया था। नोटः सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा देशभर के कई पत्रकारों को भोपाल के आसपास के गांवों का दौरा करवाया गया ताकि वे जमीनी सच्चाई को जान सकें।