दिल्ली में ट्रैफिक जाम से हर साल वर्कर्स को 25900 रुपये तक नुकसान, आर्थिक सर्वेक्षण में खुलासा
रिपोर्ट में कहा गया है, "दिल्ली में जाम की समस्या पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट के अनुसार, एक अकुशल श्रमिक को जाम की वजह से हर साल 7,200 रुपये से 19,600 रुपये तक का नुकसान होता है. इसी तरह, कुशल और उच्च कुशल कर्मचारियों को हर साल क्रमशः 8,300 रुपये से 23,800 रुपये और 9,000 रुपये से 25,900 रुपये तक का नुकसान हो सकता है." वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश किया, जिसके मुताबिक, त्वरित परिवहन प्रणाली (Rapid Transit System) को अपनाने के बावजूद, पूरे भारत में सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में कमी बनी हुई है. सर्वेक्षण में कहा गया, "इन उपायों के बावजूद, मास ट्रांसपोर्ट सर्विस में कमी बनी हुई है. शहर के लेवल के संकेतक बसों की क्षमता में कमी दिखाते हैं. आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) हर एक लाख लोगों पर 40-60 बसों की सलाह देता है. फिर भी, कई शहरों में बहुत कम बसें हैं. देश भर में, सिर्फ लगभग 47,650 बसें ही शहरी लोगों को सेवा देती हैं. इनमें से लगभग 61 प्रतिशत सिर्फ नौ बड़े शहरों में हैं. शहरी सड़कों के लेआउट की वजह से, बसों की कम उपलब्धता और अधिक निजी गाड़ियों के इस्तेमाल से प्रति लेन किलोमीटर में लोगों की संख्या कम हो जाती है, जिससे भीड़भाड़ होती है और आने-जाने में अधिक समय लगता है." मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम भारत ने पिछले दशक में मास रैपिड ट्रांजिट को बढ़ाया है. 2025 तक, लगभग 24 शहरों में 1,036 किमी मेट्रो ट्रेन/RRTS चालू हैं, और आगे भी कॉरिडोर बन रहे हैं. देश का पहला दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ नमो भारत RRTS (क्षेत्रीय तीव्र पारगमन प्रणाली) कॉरिडोर में 55 किमी चालू है और यह आनंद विहार जैसे हब पर चरणबद्ध शुरुआत और मल्टीमॉडल इंटीग्रेशन के जरिये लगभग 82 किमी पूरी तरह चालू होने की ओर बढ़ रहा है. सर्वेक्षण में कहा गया, "ये सिस्टम मेट्रो रेल पॉलिसी (2017) के तहत दिए जा रहे हैं, जिसके लिए व्यापक मोबिलिटी प्लान, UMTA व्यवस्था और व्यवहार्यता सीमा की जरूरत होती है, और नेशनल ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) पॉलिसी (2017) के तहत, जो स्टेशनों के आसपास कॉम्पैक्ट, मिक्स्ड-यूज ग्रोथ, मल्टीमॉडल इंटीग्रेशन और वैल्यू-कैप्चर फाइनेंसिंग को बढ़ावा देती है." पीएम-ई-बस सेवा (PM e Bus Sewa) के बारे में बताते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर 10,000 ई-बसों के साथ सिटी बस ऑपरेशन को मजबूत करने के लिए पीएम-ई-बस सेवा शुरू की है, जिसे 20,000 करोड़ रुपये की केंद्रीय मदद और संचालक के कैश फ्लो को सुनिश्चित करने के लिए एक भुगतान सुरक्षा तंत्र (PSM) का समर्थन मिला है. इकोनॉमिक सर्वे में आगे बताया गया है कि भारत के शहरों में ट्रैफिक जाम की वजह से उत्पादकता में कमी आती है. एक अध्ययन से पता चलता है कि दिल्ली में अकुशल श्रमिकों को जाम की वजह से हर साल 7,200 रुपये से 19,600 रुपये तक का नुकसान होता है. आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है, "सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन संस्थान (ISEC) की एक रिपोर्ट (Working Paper) में अनुमान लगाया गया है कि ट्रैफिक जाम के चलते देर से आने की वजह से बेंगलुरु शहर में 2018 में उत्पादक समय (Productive Hour) का नुकसान लगभग 7.07 लाख घंटे होगा, जिसका मतलब है लगभग 11.7 बिलियन रुपये की मौद्रिक लागत (Monetary Cost)." सर्वे में बताया गया है कि ट्रैफिक जाम की वजह से शहरों में प्रोडक्टिविटी में होने वाले नुकसान के कई अलग-अलग अनुमान हैं. अनुमानों में अंतर के बावजूद, यह स्पष्ट है कि मोबिलिटी से जुड़ी समस्याओं की लागत अधिक है और बढ़ रही है. रिपोर्ट में कहा गया है, "दिल्ली में जाम की समस्या पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट के अनुसार, एक अकुशल श्रमिक को जाम की वजह से हर साल 7,200 रुपये से 19,600 रुपये तक का नुकसान होता है. इसी तरह, कुशल और उच्च कुशल कर्मचारियों को हर साल क्रमशः 8,300 रुपये से 23,800 रुपये और 9,000 रुपये से 25,900 रुपये तक का नुकसान हो सकता है." सर्वे में यह बात सामने आई कि टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स 2024 के अनुसार, बेंगलुरु, मुंबई और नई दिल्ली में आने-जाने वालों को अपने-अपने शहर के केंद्रों में व्यस्त समय के दौरान ट्रैफिक की वजह से हर साल क्रमशः 117 घंटे, 103 घंटे और 76 घंटे का नुकसान होता है. शहरी उत्पादकता और जनसंख्या रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की शहरी आबादी तेजी से बढ़ी है, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे बड़े मेट्रो शहर अब आबादी के हिसाब से दुनिया के सबसे बड़े शहरी इलाकों में शामिल हैं. हालांकि, आबादी का पैमाना शहरी उत्पादकता, रहने लायक माहौल या ग्लोबल इकोनॉमिक असर में उसी अनुपात में नहीं बदला है." वैश्विक संकेत बताते हैं कि शहरीकरण से विकास में फायदा तब होता है जब शहर कुशल लेबर मार्केट, इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क और इंस्टीट्यूशनल कोऑर्डिनेशन के जरिये समूहीकरण अर्थव्यवस्था को अपना लेते हैं. सर्वे में कहा गया है, "भारत में, ट्रांसपोर्ट, हाउसिंग, जल, स्वच्छता, या शासन क्षमता जैसे क्षेत्रों में शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश, शहरों के आर्थिक महत्व से पीछे रहा है. इससे आबादी का घनत्व बढ़ा है, जो भीड़भाड़, अनौपचारिकीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव के रूप में सामने आया है, जिससे संभावित प्रोडक्टिविटी में होने वाले फायदे कम हो गए हैं." शहरीकरण का स्वरूप आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत के शहरीकरण का पैटर्न उसके सबसे बड़े शहरों से काफी हद तक तय होता है, '2011 में 70 प्रतिशत से अधिक शहरी आबादी क्लास I शहरों (जिनमें एक लाख से अधिक लोग रहते हैं) में रहती थी, और देश के 52 महानगरीय शहरों (10 लाख से अधिक आबादी) में ही सभी शहरी निवासियों का 42.3 प्रतिशत हिस्सा था. इन बड़े शहरों में अधिक आबादी बढ़ने की दर ने महानगरीय इलाकों को तेजी से बढ़ाया है."
