दिल्ली को कितना नुकसान पहुंचा रहे कूड़े के पहाड़? विशेषज्ञों से जानें
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट में वायु प्रदूषण विशेषज्ञ विवेक चट्टोपाध्याय बताते हैं कि भलस्वा लैंडफिल साइट पर काफी ज्यादा मात्रा में कूड़ा जल रहा है. इस दौरान धुआं काफी जहरीला होता है. उसमें पार्टिकुलेट मैटर तो होगा ही. इसमें प्लास्टिक जलाने से पैदा होने वाले विषाक्त तत्व भी नई दिल्ली. राजधानी दिल्ली तीन ओर से तीन कूड़े के पहाड़ों से घिरी हुई है. इनमें भलस्वा लैंडफिल साइट, ओखला और गाजीपुर कूड़े का पहाड़ शामिल हैं. ये तीनों कूड़े के पहाड़ दिल्ली के तीन अलग-अलग नगर निगमों के अंतर्गत आते हैं. हाल ही में भलस्वा लैंडफिल साइट में आग लगने से एक बार फिर कूड़े के पहाड़ों की ओर सभी का ध्यान गया है लेकिन छह दिन से लगातार जल रहे इस ढेर की आग अभी तक नहीं बुझाई जा सकी है. इसमें से जानलेवा धुआं और जहरीली गैसें लगातार निकल रही हैं जो न केवल आसपास के इलाके में बल्कि पूरी दिल्ली की हवा को दूषित कर रही हैं. स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञों की मानें तो ये कूड़े के पहाड़ दिल्ली के वातावरण और हवा को जहरीली बनाने के साथ ही लोगों के स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. दिल्ली के तीन इलाकों में बने इन कूड़े के पहाड़नुमा ढेर में हर साल ही आग लगने की सूचनाएं मिलती हैं. दिल्ली की गंदगी को समेटे इन ढेरों में लगातार मीथेन गैस बनती है इस वजह से भी यहां आग लगने की घटनाएं होती हैं. दिल्ली में सामान्य जगहों पर भी आग लगाने में पाबंदी है लेकिन कई सौ एकड़ में फैले इन पहाड़ों में जब तब आग लगती है और जहरीली गैसें वायुमंडल में तैरने लगती हैं. खास बात है कि दिल्ली में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के नियमों के बावजूद ये कूड़े के ढेर बढ़ते जा रहे हैं. विज्ञापन सर्दी में पराली, गर्मी में कूड़े के ढेर… सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट में वायु प्रदूषण विशेषज्ञ विवेक चट्टोपाध्याय बताते हैं कि भलस्वा लैंडफिल साइट पर काफी ज्यादा मात्रा में कूड़ा जल रहा है. इस दौरान धुआं काफी जहरीला होता है. उसमें पार्टिकुलेट मैटर तो होगा ही. इसमें प्लास्टिक जलाने से पैदा होने वाले विषाक्त तत्व भी होते हैं. इससे आसपास का इलाका तो जहरीला हो ही रहा है, वहीं हवा का रुख जिस तरफ है ये धुआं उधर पर जाकर इकठ्ठा हो रहा है और सांस के माध्यम से लोगों के शरीर में जा रहा है. सर्दी में प्रदूषण के लिए पंजाब आदि राज्यों को लेकर कहा जाता है लेकिन यह दिल्ली का खुद का मुद्दा है, जिसका समाधान होना काफी जरूरी है. स्वास्थ्य पर ये पड़ रहा है प्रभाव . विवेक कहते हैं कि कूड़े के ढेर में आग लगी है तब तो ये और भी ज्यादा खतरनाक हो रहे हैं, वहीं अगर आग नहीं भी लगी है तो भी ये दिल्ली के लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान ही पहुंचा रहे हैं. कूड़े के ढेर का दो तरह से स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. एक दीर्घकालीन और एक अल्पकालीन यानि थोड़े से समय में ही प्रभाव दिखाई देने लगता है. . कूड़े के ढेर का शॉर्ट टर्म यानि अल्पकालीन प्रभाव ये हैं कि लोगों को सांस लेने में तकलीफ होती है. दम घुटता है. जिन लोगों को दमा या अस्थमा आदि की शिकायत होती है, उनको काफी परेशानी हो सकती है. फेफड़ों को नुकसान हो सकता है. . कूड़े के ढेर से निकलने वाला धुआं और गैसें कार्बन डाई ऑक्साइड, डाईऑक्सीन, फ्यूरॉन, कार्बन मोनो ऑक्साइड आदि बहुत जहरीली होती हैं जो कैंसर आदि बीमारियों की जन्मदाता होती हैं. लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने वाले लोगों में कैंसर की बीमारी ज्यादा देखी जा सकती है. . सामान्य जन-जीवन प्रभावित रहता है. . कूड़े को जलाने से टॉक्सिक रसायन सहित कार्बन कण, बेंजीन, पारा, वैनेडियम आदि विषैले तत्व निकलते हैं. . ये विषैली गैसें दिल की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए भी नुकसानदायक हैं. . कूड़े के ढेर से लगातार गंदा पानी और तरल पदार्थ रिसते रहने से भूगर्भीय जल प्रदूषित हो जाता है. जिसकी वजह से आसपास के इलाके में भूगर्भीय जल भी संक्रमित और बीमारियों का वाहक हो जाता है. ऐसी जगहों पर रह पाना मुश्किल हो जाता है. . कूड़े से निकलने वाली गैसों से वायुमंडल प्रदूषित होता है. इससे लोगों को सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा नहीं मिल पाती. . कूड़े के ढेर के आसपास की जमीनों में भी जहरीले तत्व पहुंच जाते हैं, जिसकी वजह से उन खेतों या क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलें भी जहरीली या विषैली हो जाती हैं और खाने योग्य नहीं रहतीं.
