स्मृति शेष: भारत को पर्यावरणीय विवेक देने वाले वैज्ञानिक थे माधव गाडगिल
डॉ. गाडगिल से मेरी व्यक्तिगत मुलाकातें सीमित रहीं—एक आमने-सामने की भेंट और एक संक्षिप्त फोन बातचीत। इसके बावजूद, मुझे हमेशा ऐसा लगा कि मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। इसका कारण वे विचार थे, जो उनके लेखन में झलकते थे, और वे संस्थान थे, जिन्हें उन्होंने गढ़ा और पोषित किया। मेरे आसपास के कई पर्यावरणवादियों में वे एक अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में उपस्थित थे। वेस्टर्न घाट्स रिपोर्ट के प्रकाशन के कुछ समय बाद, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) में उनसे मेरी मुलाकात हुई। हमने रिपोर्ट के कुछ पहलुओं की आलोचना की थी, और उसी पर चर्चा करने के लिए वे आए थे। उस बातचीत में मुझे न केवल उनकी तीक्ष्ण बुद्धि का अनुभव हुआ, बल्कि यह भी स्पष्ट हुआ कि यह विषय उनके लिए कितना व्यक्तिगत था। वेस्टर्न घाट्स उनके लिए मात्र एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था; वह एक जीवित पारिस्थितिक इकाई थी, जिसके क्षरण को रोकना वे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते थे।
