जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से जूझता देश
दुनिया के अमीर देश हों या गरीब, जलवायु परिवर्तन से आने वाली आपदा से कोई नहीं बचा है। भारत में भी पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का असर अब गहराई से अनुभव किया जाने लगा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अलावा देश के तमाम छोटे-बड़े शहर पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से कराह रहे हैं। बढ़ता प्रदूषण संकट आम लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहा है। दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में तीसरे स्थान पर आने वाली दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक का 450 के आसपास बना रहना, निश्चय ही खतरे की घंटी है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस संकट की जड़ में मानव-जनित जलवायु परिवर्तन है। 1990 के दशक की शुरुआत से भारत का औसत तापमान 0.89 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। प्रदूषण के साथ अब जलवायु परिवर्तन का असर भी साफ तौर पर दिखने लगा है। इस साल ठंड ने उत्तर भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत को भी अपनी चपेट में लिया है। भारत के दक्षिणी प्रायद्वीपीय राज्यों- तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश-तेलंगाना और केरल को समशीतोष्ण या उष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए जाना जाता है, जहां शीत लहर की स्थिति दुर्लभ होती है। हाल के वर्षों में ठंड के मौसम में उत्तरी हवाओं के असामान्य रूप से गहरे प्रवेश के कारण इन क्षेत्रों के आंतरिक हिस्सों में तापमान में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। केरल के मुन्नार में तापमान गिरकर 0 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। यह केरल में इस सीजन का सबसे कम तापमान है। मौसम अधिकारियों के अनुसार, आने वाले दिनों में तापमान शून्य से भी नीचे जा सकता है। मुन्नार के तापमान ने लोगों को हैरत में इसलिए डाला है क्योंकि केरल का औसत तापमान दिसंबर में 30 डिग्री सेल्सियस के करीब रहता है। दिसंबर के महीने में यहां औसत अधिकतम तापमान 23 डिग्री और न्यूनतम 12 डिग्री सेल्सियस रहता है। केरल के अलावा दक्षिण भारत में तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद, चेन्नई के अलावा कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में मौसम परिवर्तन का असर देखा जा रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट और पत्रिका डाउन टू अर्थ के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से नवंबर 2025 के बीच 334 में से 331 दिन ऐसे रहे, जब देश के किसी ना किसी हिस्से में अत्यधिक मौसमीय घटना दर्ज की गई। यानी पूरे साल का लगभग 99 प्रतिशत समय। अगर 2024 से तुलना करें तो पिछले साल यह आंकड़ा 295 दिनों का था। इन आपदाओं में 4400 से अधिक लोगों की जान गई और करीब 1.74 करोड़ हैक्टेयर फसल बर्बाद हो गई जो बदलते जलवायु संकट की भयावह तस्वीर पेश करती है। मानसून बाढ़ से 2707 लोगों की जान गई। आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक 608 मौतें, जबकि मध्य प्रदेश में 537 लोगों की जान गई। प्री-मॉनसून महीनों में ही 990 मौतें हुईं, जो 2022 की तुलना में लगभग 3 गुना थीं। अगस्त में आई बाढ़ के बाद पंजाब के कई जिलों में खेत पूरी तरह तबाह हो गए। भारत दुनिया के उन दस देशों में शामिल है जो बीते तीन दशकों में जलवायु आपदाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। पर्यावरण थिंक टैंक जर्मनवॉच की नई रिपोर्ट क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 के मुताबिक, 1995 से 2024 के बीच भारत में करीब 4.30 मौकों पर प्राकृतिक रूप से असहनीय मौसम की घटनाओं ने 80 हजार से अधिक लोगों की जान ली और 1.3 अरब से ज्यादा लोगों को प्रभावित किया। इन आपदाओं से भारत को लगभग 170 अरब डॉलर (करीब 14 लाख करोड़ रुपए) का आर्थिक नुक्सान हुआ है। यह रिपोर्ट ब्राजील के बेलेम शहर में आयोजित कॉप 30 सम्मेलन में जारी की गई। इसमें कहा गया कि भारत में लगातार बढ़ती बाढ़, चक्रवात, सूखा और भीषण गर्मी जैसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन के गंभीर असर को रेखांकित करती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की स्थिति लगातार खतरे जैसी है, यानी ये घटनाएं अब अलग-अलग नहीं, बल्कि बार-बार दोहराई जा रही हैं। इससे विकास की उपलब्धियों पर असर पड़ रहा है और करोड़ों लोगों की आजीविका खतरे में है। भारत की विशाल जनसंख्या और मानसूनी पैटर्न पर निर्भरता इसे खासतौर पर संवेदनशील बनाती है। रिपोर्ट बताती है कि हर साल करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में भीषण मौसम की चपेट में आते हैं। साल 2024 में अकेले भारी मानसूनी बारिश और अचानक आई बाढ़ों ने गुजरात, महाराष्ट्र और त्रिपुरा में करीब 80 लाख लोगों को प्रभावित किया। पिछले वर्ष दुनियाभर में सबसे ज्यादा नुक्सान बाढ़ और तूफानों से हुआ, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर अरबों डॉलर का नुक्सान पहुंचाया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, यदि जलवायु परिवर्तन से निपटने की रफ्तार सुस्त रही तो वर्ष 2100 तक दुनिया का तापमान लगभग 2.6 से 2.8 डिग्री तक बढ़ सकता है लेकिन अगर नेट जीरो से जुड़े वादे पूरे कर लिए जाएं तो यह 1.9 डिग्री तक गिर सकता है। इसके तहत सभी देशों को अपने ग्रीन हाउस गैसों के उत्पादन को घटना है। भारत में हाल ही के वर्षों में देश में आने वाले चक्रवाती तूफानों की आवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ी है। बात चाहे तौकते तूफान की करें या अम्फान की। वैश्विक तपन में वृद्धि के कारण तूफान और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं में भी बढ़ाैतरी हो रही है। जलवायु परिवर्तन पर सरकार की ओर से कुछ साल पहले एक कार्य योजना तैयार कराई गई थी। उसमें चिंता जताई गई थी कि वर्ष 2021 से 2050 के दौरान समुद्री तापमान में 1.8 से 2.4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। जलवायु-संबंधी आपदाओं का संचयी प्रभाव गंभीर आर्थिक नुक्सान पहुंचा रहा है तथा भारत के विकास पथ को खतरे में डाल रहा है। जलवायु जोखिम सूचकांक- 2025 ने वर्ष 1993 से वर्ष 2022 तक भारत को वैश्विक स्तर पर छठा सबसे अधिक प्रभावित देश बताया, जहां नुकसान 180 अरब डॉलर से अधिक था। हालिया शोध बताते हैं कि जलवायु संकट के कारण वर्ष 2100 तक देश की राष्ट्रीय आय का 6.4 से 10 फीसदी से अधिक का नुकसान हो सकता है जिससे 5 करोड़ और लोग फिर से गरीबी में धंस जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट, ग्लोबल स्टॉकटेक, के अनुसार तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक नियंत्रित रखने के लिए जितने कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती की जरूरत है, वर्ष 2030 तक उसकी तुलना में वायुमंडल में इस गैस का उत्सर्जन 22 अरब टन अधिक होगा। जलवायु परिवर्तन नियंत्रण के लिए दुनियाभर की सरकारों को त्वरित प्रभावी कार्यवाही करनी होगी, पर पूरी दुनिया इस समस्या के प्रति उदासीन और लापरवाह है। रिपोर्ट के अनुसार यदि जलवायु परिवर्तन नियंत्रण के लक्ष्य को पाना है तो सबसे पहले जीवाश्म ईंधनों का मोह त्यागना होगा और इनका उपयोग शीघ्र बंद करना पड़ेगा। पर, तमाम चेतावनियों के बाद भी जीवाश्म ईंधनों का केवल उपयोग ही नहीं बढ़ता जा रहा है बल्कि इस उद्योग को सरकारों से मिलने वाली सब्सिडी या रियायतें भी बढ़ती जा रही हैं। जलवायु के मौजूदा मॉडल बताते हैं कि सदी के मध्य तक वैश्विक तापमान 1.2 से 1.3 डिग्री सेल्सियस और बढ़ सकता है। मानसून की कुल बारिश 6-8 प्रतिशत बढ़ेगी लेकिन उतार-चढ़ाव बेहद अस्थिर होगा। वैश्विक तपन और जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनियाभर में बहस भी लंबे समय से चल रही है। कुछ देश इस मुद्दे पर साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं तो कुछ इसकी चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए अपने यहां अंधाधुंध औद्योगिक विकास को बढ़ावा दे रहे हैं। इसे लेकर कई सालों से जलवायु परिवर्तन के विषय पर शोधकर्ता वैज्ञानिक लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि वर्ष 2070 तक धरती का तापमान इतना अधिक बढ़ जाएगा कि यहां रहना तकरीबन असंभव हो जाएगा।
