इलेक्ट्रिक व्हीकल के 30%@2030 के लक्ष्य से कोसोें दूर है झारखंड, 78.88% CAGR की जरूरत
झारखंड इलेक्ट्रिक व्हीकल के 2030 तक 30 प्रतिशत हिस्सेदारी के लक्ष्य को हासिल करने से काफी पिछड़ चुका है। जब देश के कई राज्यों ने जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में 2023 व 2030 के लिए लक्ष्य निर्धारित कर उस दिशा में बढने की शुरुआत कर दी थी तो झारखंड फिलहाल इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी के प्रारूप पर ही चर्चा कर रहा है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (Hemant Soren) ने पिछले ही महीने नई दिल्ली में आयोजित इनवेस्टर्स मीट में इलेक्ट्रिक व्हीकल की पॉलिसी की चर्चा की। हालांकि इस प्रस्ताव के प्रारूप को अबतक सार्वजनिक नहीं किया गया है। झारखंड इलेक्ट्रिक व्हीकल के 2030 तक 30 प्रतिशत हिस्सेदारी के लक्ष्य को हासिल करने से काफी पिछड़ चुका है। जब देश के कई राज्यों ने जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में 2023 व 2030 के लिए लक्ष्य निर्धारित कर उस दिशा में बढने की शुरुआत कर दी थी तो झारखंड फिलहाल इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी के प्रारूप पर ही चर्चा कर रहा है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (Hemant Soren) ने पिछले ही महीने नई दिल्ली में आयोजित इनवेस्टर्स मीट में इलेक्ट्रिक व्हीकल की पॉलिसी की चर्चा की। हालांकि इस प्रस्ताव के प्रारूप को अबतक सार्वजनिक नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 27 अगस्त 2021 को नई दिल्ली में राज्य सरकार की ओर से आयोजित इन्वेस्टर्स मीट में निवेशकों से कहा, प्रस्तावित इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी आप लोगों के सामने प्रस्तुत है। अगर हम भविष्य की ओर देखें तो मेरा मानना है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल भविष्य का व्हीकलहै, जहां हम जितना चाहें उतना कर सकते हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अगले दिन इस सम्मेलन में कहा कि रिन्यूबल एनर्जी में हम एक बड़ा प्रोजेक्ट लेकर आ रहे हैं। सीएम सोरन इस निवेश सम्मेलन में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए नयी निवेश नीति की घोषणा की और उन्होंने व मुख्य सचिव सुखदेव सिंह ने सिंगल विंडो सिस्टम जैसी सुविधाएं देने का वादा किया। हालांकि इस कथन पर दो राय नहीं हो सकती है कि 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल ही भविष्य के वाहन हैं, लेकिन राज्य इस बड़े उद्देश्य को हासिल करने में देश के कई राज्यों से पिछड़ चुका है, जबकि देश खुद इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जो रफ्तार चाहिए उससे काफी धीमी गति से आगे बढ रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट – CSE (Centre for Science and Environment) ने अपने एक हालिया अध्ययन के आधार पर भारत के इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी एवं प्रोग्राम को ए केस ऑफ मिस्ड अपरच्यूनिटी (a case of missed opportunities) यानी अवसर गंवा देने का मामला करार दिया है। अपने अध्ययन के आधार पर सीइसी ने कहा है कि भारत को 30%@2030 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए 46 प्रतिशत सीएजीआर (Compound Annual Growth Rate – चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर) से आगे बढना होगा। अगर भारत इस दर से आगे बढता है तो वह 2030 तक न्यूनतम लक्ष्य 30 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वेहकिल बिक्री को हासिल कर सकेगा, हालांकि यह अलग बात है कि इसका उच्चतम लक्ष्य नीति आयोग ने 70 प्रतिशत व SIAM (Society of Indian Automobile Manufacturers) ने 40 प्रतिशत रखा है। अगर झारखंड की इन आंकड़ों से तुलना करें तो इसे अगले नौ साल में न्यूनतम लक्ष्य हासिल करने के लिए 78.88 प्रतिशत की रफ्तार से इलेक्ट्रिक व्हीकल के क्षेत्र में आगे बढना होगा। यह एक बहुत बड़ा लक्ष्य है और इसे हासिल करने के लिए बेहद ठोस नीति व कार्ययोजना की जरूरत होगी, जिसका अभी राज्य को इंतजार है। राज्य में इलेक्ट्रिक व्हीकल को लेकर ठोस नीति के अभाव में इस ओर वाहन खरीदारों का रूझान काफी कम है। देश में जहां इस महीने के पूर्वार्द्ध तक कुल वाहनों में 1 प्रतिशत से कुछ कम इलेक्ट्रिक व्हीकल रजिस्टर्ड हुए हैं, वहीं झारखंड में यह मात्र 0.159 प्रतिशत है। साढे तीन करोड़ की आबादी वाले राज्य झारखंड में प्रति महीने रजिस्टर्ड होने वाले इलेक्ट्रिक वेहकिल के आंकड़े तीन अंकों में सीमित हैं। आंकड़े नीचे देखें : 20 सितंबर 2021 तक के सरकार के उपलब्ध आंकड़ें के अनुसार, झारखंड में जहां 9,49,020 लाख डीजल वाहन व 50,83,240 पेट्रोल वाहन रजिस्टर्ड हैं, वहीं इलेक्ट्रिक(बीओवी) वाहन मात्र 9798 रजिस्टर्ड हैं। सीएनजी संचालित वाहन 1282, डीजल/हाइब्रिड 3711, इथेनॉल के दो, सिर्फ एलपीजी के 17 एवं पेट्रोल/सीएनजी के 4233 व पेट्रोल/हाइब्रिड के 5935 एवं पेट्रोल/एलपीजी के 311 वाहन रजिस्टर्ड हैं। राज्य में कुल रजिस्टर्ड वाहनों की संख्या 61,47489 है। इस साल 20 सितंबर 2021 तक रजिस्टर्ड हुए कुल 3,28,347 वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या 1819 है जो आधे प्रतिशत से थोड़ा अधिक यानी 0.55 प्रतिशत है। वहीं, पिछले साल रजिस्टर्ड हुए कुल 4,82,852 वाहनों में इलेक्ट्रिक वेहकिल की संख्या 1516 थी। यानी साल-दर-साल इसमें बेहद मामूली इजाफा आप आंकड़ों को बारीक विश्लेषण करने पर देख सकते हैं, लेकिन यह स्वतः है जो इंगित करती है कि उपभोक्ताओं की इसमें रुचि है, लेकिन ग्राहक व मैन्युफेक्चरर उसके लेकर एक ठोस नीति देखना चाहते हैं। क्या इलेक्ट्रिक वेहकिल आम लोगों के लिए कम भरोसेमंद हैं? भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल का चलन आरंभिक दौर में है। और, जब किसी नई चीज का चलन आरंभ होता है तो उसकी विश्वसनीयता व टिकाऊपन पर बार-बार सवाल उठाये जाते हैं। हमने सेंटर फॉर साइंस एंड इनवारमेंट की विशेषज्ञ से यह सवाल पूछा। इस सवाल के जवाब में सीएसइ की सीनियर प्रोग्राम मैनेजर (स्वच्छ हवा और सतत गतिशीलता कार्यक्रम) मौसमी मोहंती स्वच्छ हवा और सतत गतिशीलता कार्यक्रमने कहा, इलेक्ट्रिक वाहन भरोसेमंद हैं और इस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, इनकी तुलना में पेट्रोल-डीजल के वाहन अधिक जटिल होते हैं। वहीं, इलेक्ट्रिक व्हीकल में जटिलता नहीं होती। मौसमी मोहंती ने कहा, इलेक्ट्रिक व्हीकल में जो कुछ जटिलताएं हैं, वह सॉफ्टवेयर की वजह से हैं। उस पर काम करने की जरूरत है। आगे की राह क्या हो सकती है? सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट ने अपने अध्ययन के आधार पर देश के लिए जो प्रमुख सुझाव दिए हैं, उसे झारखंड के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। सीएसइ ने कहा है कि जबकि प्रोत्साहन आधारित नीतियां मौजूद हैं, तो शून्य उत्सर्जन वाहन को लेकर स्पष्ट शासनादेश की आवश्यकता है। यह बाजार को एक निश्चितता प्रदान कर सकता है, निवेशकों को प्रोत्साहित कर सकता है। इसके साथ ही कुछ सवालों को एड्रेस करने की आवश्यकता है। इसमें उद्योगों को लचीलापन प्रदान करना, मजबूत आपूर्ति व बड़े मॉडल की उपलब्धता सुनिश्चित करना व विषम लागत महत्वपूर्ण बिंदु हैं।
