हिमालय को बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता
हिमालय को बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता उम्मीद की जानी चाहिए कि विजय बहुगुणा वाली गलतियां आने वाले समय में कोई भी सरकार न करने पाए उम्मीद की जानी चाहिए कि विजय बहुगुणा वाली गलतियां आने वाले समय में कोई भी सरकार न करने पाए। केंद्र सरकार को विकास के लिए अन्य जगहों से अलग तरह की नीतियों को हिमालय में लागू करना चाहिए। हिमालय के क्षेत्र में आने वाले सभी राज्यों की सरकारों को शामिल करके केंद्र सरकार एक ज़रूरी नीति की घोषणा कर सकती है। उत्तर दिशा में स्थित देवात्मा हिमालय नाम के नगाधिराज पर प्रकृति का एक और आक्रोश फूटा है। इंसान की गलत नीतियों का खामियाजा हिमालय को भोगना पड़ता है। उत्तराखंड के चमोली जिले में एक ग्लेशियर फटने से ऋषि गंगा क्षेत्र में तबाही आई है। वहां के एक बिजली उत्पादन केंद्र पर मुख्य रूप से असर पड़ा है। अपने देश में बिजली के उत्पादन को विकास से जोड़ा जाता है। पूंजी के बल पर राज करने वाले लोगों के एक वर्ग ने विकास की अजीब परिभाषा प्रचलित कर दी है। ग्रामीण इलाकों को शहर जैसा बना देना विकास माना जाता है। पूंजीपति वर्ग आर्थिक तरक्की के लिए कुछ भी तबाह कर देने पर आमादा हैं। इसी चक्कर में अब उत्तराखंड के पहाड़ तबाही की जद में हैं। इस बार की चमोली की घटना में लगातार गर्म होते जा रहे पर्यावरण का भी योगदान है। विश्व के नेता क्लाइमेट चेंज को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे गैरजिम्मेदार नेता तो पेरिस समझौते से अमेरिका को बाहर ले गए थे। यह तो गनीमत है कि नए राष्ट्रपति जो बाइडेन ने फिर से अमेरिका को पेरिस वार्ता से जोड़ दिया है। क्लाइमेट चेंज का खामियाजा दुनिया भर को झेलना पड़ेगा। भारत ने चमोली में झेल लिया। सफलता के लिए इस दिशा में दुनिया भर के देशों के साथ मिलकर चलना पड़ेगा। भारत अकेले कुछ नहीं कर सकता। लेकिन अकेले यह तो किया ही जा सकता है कि अपने हिमालय को बचाने के लिए जो जरूरी उपाय हों। हिमालय को पूंजीपति वर्ग के स्वार्थों और मैदानी तर्ज के विकास की सोच के कारण इतना कमजोर कर दिया गया है कि वह बारिश को भी संभाल नहीं पाता, ग्लेशियर फटने की बात तो अलग है। आज उत्तराखंड, खासकर गढ़वाल क्षेत्र में हिमालय नकली तरीके के विकास की साजीश का शिकार हो चुका है और वह प्रकृति के मामूली गुस्से को भी नहीं झेल पा रहा है। हिमालय के प्रति अपमान का आलम यह है कि गंगा नदी को उसके उद्गम के पास ही बांध दिया गया है। बड़े बांध बन गए हैं और भारत की संस्कृति से जुड़ी यह नदी कई जगह पर अपने रास्ते से हटाकर सुरंगों के जरिये बहने को मजबूर कर दी गई है। पहाड़ों को खोखला करने का सिलसिला टिहरी बांध की परिकल्पना के साथ शुरू हुआ था। 1974 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, हेमवती नंदन बहुगुणा ने सपना देखा था कि प्रकृति पर विजय पाने की लड़ाई के बाद जो जीत मिलेगी वह पहाड़ों को भी उतना ही संपन्न बना देगी जितना मैदानी इलाकों के शहर हैं। उनका कहना था कि पहाड़ों पर बांध बनाकर देश की आर्थिक तरक्की के लिए बिजली पैदा की जायेगी। इसी सोच के चलते गंगा को घेरने की योजना बनाई गई थी। ऐसा लगता है कि हिमालय के पुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा को यह बिल्कुल अंदाजा नहीं रहा होगा कि वे किस तरह की तबाही को अपने हिमालय में न्योता दे रहे हैं। पहाड़ों से बिजली पैदा करके संपन्न होने की दीवानगी के चलते ही उत्तरकाशी और गंगोत्री के 125 किलोमीटर इलाके में पांच बड़ी बिजली परियोजनाएं हैं। जिसके कारण गंगा को अपना रास्ता छोड़ना पड़ा। इस इलाके में बिजली की परियोजनाएं एक दूसरे से लगी हुई हैं। एक परियोजना जहां खत्म होती है वहीं से दूसरी शुरू हो जाती है। यानी नदी एक सुरंग से निकलती है और फिर दूसरी सुरंग में घुस जाती है। इसका मतलब ये है कि जब ये सारी परियोजनाएं पूरी हों जाएंगी तो इस पूरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर गंगा अपना स्वाभाविक रास्ता छोड़कर सिर्फ सुरंगों में बह रही होगी। वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में रखा है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। गंगा मछलियों की 140 प्रजातियों को आश्रय देती है। इसमें पांच ऐसे इलाके हैं जिनमें मिलने वाले पक्षियों की किस्में दुनिया के किसी अन्य हिस्से में नहीं मिलतीं। जानकार कहते हैं कि गंगा के पानी में अनूठे बैक्टीरिया प्रतिरोधी गुण हैं। यही वजह है कि दुनिया की किसी भी नदी के मुकाबले इसके पानी में आक्सीजन का स्तर 25 फीसदी ज्यादा होता है। ये अनूठा गुण तब नष्ट हो जाता है जब गंगा को सुरंगों में धकेल दिया जाता है जहां न ऑक्सीजन होती है और न सूरज की रोशनी। इसके बावजूद सरकारें बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी देने पर आमादा रहती हैं। भागीरथी को सुरंगों और बांधों के जरिए कैद करने का विरोध तो स्थानीय लोग तभी से कर रहे हैं जब इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी। लेकिन वहीं पर रहने वाले बहुत से नामी साहित्यकार और बुद्धिजीवी इस अनुचित विकास की बात भी करने लगे हैं। उसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल थे जिन्होंने पहले बड़े बांधों के नुकसान से लोगों को आगाह भी किया था लेकिन बाद में पता नहीं किस लालच में वे सत्ता के पक्षधर बन गए। ऐसा भी नहीं है कि हिमालय और गंगा के साथ हो रहे अन्याय से लोगों ने आगाह नहीं किया था। बीस साल पहले सुनीता नारायण, मेधा पाटकर, आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर जी डी अग्रवाल और बहुत सारे हिमालय प्रेमियों ने इसका विरोध किया। बहुत सारी पत्रिकाओं ने बाकायदा अभियान चलाया लेकिन सरकारी तंत्र ने कुछ नहीं सुना। सरकार ने जो सबसे बड़ी कृपा की थी वह यह कि प्रोफेसर अग्रवाल का अनशन तुड़वाने के लिए उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने दो परियोजनाओं को अस्थायी रूप से रोकने पर सहमत जता दी थी लेकिन बाद में फिर उन परियोजनाओं पर उसी अंधी गति से काम शुरू हो गया। सबसे तकलीफ की बात यह है कि भारत में बड़े बांधों की योजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है जब दुनिया भर में बड़े बांधों को हटाया जा रहा है। अकेले अमेरिका में ही करीब 700 बांधों को हटाया जा चुका है। सेंटर फार साइंस एंड इन्वायरमेंट ने एक रिपोर्ट जारी करके कहा था कि 25 मेगावाट से कम की जिन छोटी पनबिजली परियोजनाओं को सरकार बढ़ावा दे रही है उनसे भी पर्यावरण को बहुत नुकसान हो रहा है। आज जो चमोली में हुआ है वही 2013 में केदारनाथ में हुआ था। उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हिमालय की इकोलाजी से खिलवाड़ करने वाली नीतियों को रोकने की सलाह दी गई थी। वे उन दिनों कांग्रेस में थे। जून 2013 की बाढ़ को ठीक से संभाल नहीं पाए थे। उनकी चौतरफा आलोचना हुई थी। उसी सिलसिले में उनको मुख्यमंत्री पद भी गंवाना पड़ा था। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और केदारनाथ में फंसे हुए गुजरातियों को बचाने के लिए उन्होंने गुजरात सरकार को सक्रिय कर दिया था। नरेंद्र मोदी ने विजय बहुगुणा और मनमोहन सिंह सरकार की केदारनाथ की बाढ़ के कुप्रबंध को लेकर सख्त आलोचना की थी। आज उनकी सरकार केंद्र में भी है और राज्य में भी। उम्मीद की जानी चाहिए कि विजय बहुगुणा वाली गलतियां आने वाले समय में कोई भी सरकार न करने पाए। केंद्र सरकार को विकास के लिए अन्य जगहों से अलग तरह की नीतियों को हिमालय में लागू करना चाहिए। हिमालय के क्षेत्र में आने वाले सभी राज्यों की सरकारों को शामिल करके केंद्र सरकार एक ज़रूरी नीति की घोषणा कर सकती है।
