Opinion: लोगों को बस और मेट्रो पर भरोसा क्यों नहीं? मजबूरी में सार्वजनिक परिवहन का सहारा
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ( NSO ) ने पिछले दिनों पहले राष्ट्रीय घरेलू यात्रा सर्वेक्षण (NHTS) के आंकड़े जारी किए। पिछले साल जुलाई से इस साल जून के बीच करीब 4.9 लाख परिवारों पर किए गए सर्वे में पाया गया कि रात की यात्रा के लिए तीन चौथाई लोग बस या ट्रेन का सहारा लेते हैं। वहीं, 42.6% लोग रोजाना दोपहिया से काम पर जाते हैं। शहरों में यह औसत 52.3 है। वहीं, हर रोज 9.2% लोग बस से दफ्तर जाते हैं और तकरीबन 5%, मेट्रो, लोकल ट्रेन या ट्राम का उपयोग करते हैं। दूरी में अंतर सर्वे में काम पर जाने वाले महिला और पुरुषों के बीच बड़ा अंतर देखा गया। 61.9% पुरुष एक किमी से ज्यादा दूर काम करने जाते हैं, जबकि 41.9% महिलाएं ही ऐसा करती हैं। शहरों में 21.7% महिलाएं दफ्तर जाने के लिए बसों पर निर्भर हैं, जबकि 57% पुरुष बाइक स्कूटी से सफर करते हैं। आंकड़े सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के भारतीय शहरों के आकलन के अनुरूप हैं। CSE के मुताबिक, शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की 25% हिस्सेदारी है, जबकि निजी वाहनों का हिस्सा है 35-45% 1 स्थानीय स्तर पर अध्ययन से इन्हें बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। सस्ता नहीं कोलकाता और दिल्ली में एक स्टडी हुई। इसमें यात्रा के साधन, किराया, इंतजार और इंटरचेंज में लगने वाला वक्त शामिल था। पता चला कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिर्फ किराये के लिहाज से सस्ता है। कोलकाता में सार्वजनिक परिवहन का औसतन 1.47 रुपये प्रति किमी किराया है और अपनी गाड़ी से हर किमी पर औसतन तीन रुपये का ईंधन खर्च होता है। लेकिन, पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर आप रोजाना अपनी आमदनी का 5.6% हिस्सा खर्च करते हैं, जबकि अपनी गाड़ी से सिर्फ 3.5%। सुरक्षा की चिंता CSE के सर्वे में दिल्ली के 94% बस और 63% मेट्रो यात्रियों ने बताया कि यह सस्ता है, इसलिए इससे यात्रा करते हैं। यह दर्शाता है कि कई लोग पसंद के बजाय मजबूरी में सार्वजनिक परिवहन का सहारा लेते हैं। साउथ दिल्ली के यात्रियों को पैदल चलने और गाड़ियों का इंतजार करने से समस्या होती है। भीड़ का कारण भारत में हर एक लाख लोगों पर सिर्फ 10 बसें हैं। 2014 से 2019 के बीच 19 बड़े राज्य परिवहन उपक्रमों के बेड़े में सिर्फ 4.6% बसें बढ़ीं और यात्रियों की संख्या 5.8% कम हो गई। बसें कम होने से लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। दिल्ली में सुबह के वक्त बसों की रफ्तार 41% तक घट जाती है। नतीजतन, लोग निजी गाड़ियों या शेयरिंग ऑटो का सहारा लेते हैं, जिससे भीड़ और बढ़ जाती है।
