पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध कारगर नहीं, संतुलित दृष्टिकोण की ज़रूरत: सुप्रीम कोर्ट
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट कई बार इस पर खुलकर अपनी राय भी ज़ाहिर कर चुका है कि कम अज़ कम राजधानी में बढ़ते प्रदूषण के स्तर को रोकने के लिए न सिर्फ़ दिल्ली में बल्कि आसपास के राज्यों को भी पटाखों के इस्तेमाल और पराली जलाने की घटनाओं से सख्ती से निपटने की ज़रूरत है. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (26 सितंबर) को कहा कि पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध से माफियाओं को इस उद्योग पर कब्जा करने और अवैध रूप से अपना माल जनता को बेचने का रास्ता खुल जाएगा. द हिंदू की खबर के मुताबिक, भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात का उल्लेख किया कि कैसे बिहार में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध के कारण माफियाओं का उदय हुआ है. मुख्य न्यायाधीश गवई ने हजारों श्रमिकों को रोजगार देने वाले पटाखा उद्योग के खिलाफ कठोर और तानाशाह दृष्टिकोण अपनाने की बेकार कोशिश पर टिप्पणी करते हुए कहा, ‘जैसा कि हमने अतीत में अनुभव किया है, पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं किया जा सकता है.’ इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ‘संतुलित दृष्टिकोण’ अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि इसे लेकर एक ऐसी नीति होनी चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि पटाखा उद्योग में आजीविका कमाने का अधिकार, वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों से प्रभावित हुए बिना, स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार के साथ सह-अस्तित्व में रहे. पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय को एक ऐसा समाधान खोजने का निर्देश दिया है, जिसमें सभी पहलुओं पर विचार किया जा सके. मालूम हो कि इस संबंध में अदालत से पटाखा निर्माताओं और विक्रेताओं सहित सभी हितधारकों की बात सुनने को कहा गया है. हरित पटाखों की अनुमति इस बीच अदालत ने उन निर्माताओं को, जिन्हें नीरी (एनईईआरआई) और पेसो (पीईएसओ) द्वारा हरित पटाखे बनाने का प्रमाण पत्र प्राप्त है, अपना काम जारी रखने की अनुमति दे दी है. हालांकि, अदालत ने इन निर्माताओं को यह वचन देने का निर्देश दिया है कि वे अगले आदेश तक प्रतिबंधित क्षेत्रों में अपने उत्पाद नहीं बेचेंगे. ज्ञात हो कि इस संबंध में 12 सितंबर को हुई पिछली सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश ने पूरे देश में पटाखों के निर्माण, बिक्री और उपयोग के लिए एक समान नीति बनाने और उसे लागू करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था. मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा था, ‘अगर पटाखों पर प्रतिबंध लगाना है, तो यह पूरे देश के लिए करना होगा… साथ ही, इस उद्योग पर निर्भर गरीबों का भी ध्यान रखना होगा.’ मुख्य न्यायाधीश गवई ने पूछा था कि देश के अन्य हिस्सों और शहरों में रहने वाले नागरिकों को वायु प्रदूषण से राष्ट्रीय राजधानी शहर के ‘अभिजात वर्ग’ (Elite) के समान राहत क्यों नहीं दी जानी चाहिए. उल्लेखनीय है कि अदालत ने अप्रैल 2025 में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पटाखों की बिक्री, उत्पादन और निर्माण पर ‘सर्वव्यापी, स्थायी’ प्रतिबंध की पुष्टि की थी. उस समय सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकों के स्वच्छ वायु के अधिकार की रक्षा के लिए इस तरह के कठोर कदम को ‘बेहद आवश्यक’ पाया था. तब अदालत ने तर्क दिया था कि प्रतिबंध को सर्दियों या त्योहारों के मौसम के कुछ महीनों तक सीमित रखने से कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि पटाखों का भंडारण साल भर केवल प्रतिबंध अवधि के दौरान ही बिक्री और उपयोग के लिए किया जाएगा. कोर्ट ने ‘तथाकथित हरित पटाखों’ में वैज्ञानिक सुधार करने की ज़िम्मेदारी निर्माताओं पर डाल दी थी. इस मामले में न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने कहा था, ‘यह गलत धारणा है कि वायु प्रदूषण केवल अभिजात वर्ग की समस्या है. असल में, इससे सड़कों पर रहने वाले लोग पीड़ित हैं. निर्माण मजदूर और दिहाड़ी मजदूर…’ पटाखा उद्योग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा था कि अप्रैल 2025 में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पटाखों की बिक्री, उत्पादन और निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सर्वोच्च न्यायालय की पुष्टि के कारण उनके लाइसेंस रद्द किए जा रहे हैं. इनमें से कुछ लाइसेंस 2028 तक वैध थे. पराली जलाने की घटनाएं मालूम हो कि बीते साल इस मामले की न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) और वरिष्ठ वकील अपराजिता सिंह ने अदालत का ध्यान पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं की ओर भी दिलाया था. उन्होंने कहा था, ‘दीपावली के एक दिन पहले यानी 30 अक्टूबर 2024 को लगभग 160 जगहों पर पराली जलाने की घटना दर्ज़ हुई है. दीपावली के दिन यानी 31 अक्टूबर को यह संख्या बढ़कर 605 हो गई.’ सुप्रीम कोर्ट में इस सुनवाई के दौरान उस रिपोर्ट का भी ज़िक्र हो चुका है जब 2015 में प्रदूषण का ओजोन परत पर पड़ते प्रभाव के विश्लेषण के दौरान मॉनिटर ने अपना काम करना बंद कर दिया था. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट कई बार इस पर खुलकर अपनी राय भी ज़ाहिर कर चुका है कि कम अज़ कम राजधानी में बढ़ते प्रदूषण के स्तर को रोकने के लिए न सिर्फ़ दिल्ली में बल्कि आसपास के राज्यों को भी पटाखों के इस्तेमाल और पराली जलाने की घटनाओं से सख्ती से निपटने की ज़रूरत है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशानिर्देशों के बावजूद, पंजाब और हरियाणा में अब तक पूरी तरह से पटाखों पर प्रतिबंध नहीं लग सका है. इस मामले में ध्यान देने वाली बात ये भी है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ सरकारों को सख्ती से निपटने की बात कही थी. इस संबंध में अदालत ने कहा था, ‘पराली जलाने वालों के खिलाफ दंडात्मक प्रावधान क्यों नहीं किए जा रहे हैं. सरकार कार्रवाई से कतरा क्यों रही है. कुछ लोगों को जेल भेजने से सही संदेश जाएगा.’ सीजेआई बीआर गवई ने आगे कहा था कि हम किसानों का सम्मान करते हैं क्योंकि वो हमें खाना देते हैं, लेकिन किसी को भी पर्यावरण को दूषित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. मालूम हो कि इसी साल जुलाई के महीने में भारत की राजधानी दिल्ली में खतरनाक वायु प्रदूषण से निपटने के लिए पुराने वाहनों को ईंधन की बिक्री बंद करने के दो दिन बाद अधिकारियों ने 3 जुलाई को कहा कि यह प्रतिबंध व्यावहारिक नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक, कई अध्ययनों में बताया गया है कि नई दिल्ली को नियमित रूप से दुनिया भर में सबसे प्रदूषित राजधानियों में से एक माना जाता है, जहां वाहनों से होने वाला उत्सर्जन सबसे अधिक खतरनाक है. द लांसेट मेडिकल जर्नल में छपे एक अध्ययन के अनुसार, 2019 में भारत में 1.67 मिलियन असामयिक मौतें वायु प्रदूषण के कारण हुईं. ज्ञात हो कि हर साल सर्दी में वाहनों और कारखानों से निकलने वाले उत्सर्जन के साथ-साथ आस-पास के राज्यों में खेतों में पराली जलाने से उत्पन्न हुई आग शहर को धुंध में लपेट देती है. ठंडा तापमान और धीमी गति से चलने वाली हवाएं घातक प्रदूषकों को फंसाकर स्थिति को और खराब कर देती हैं. ऐसे में जीवाश्म ईंधन से चलने वाले परिवहन पर आंशिक प्रतिबंध और टैंकर द्वारा पानी के छिड़काव जैसी सरकार की छोटी-छोटी पहलों का कोई खास असर नहीं हुआ है.
