पपीते के बीज और सहजन से डेयरी अपशिष्ट जल को स्वच्छ बनाने की कोशिश
प्रदूषित पानी की सफाई सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की 2024 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत के शहरों से निकलने वाले गंदे पानी और सीवेज का एक-तिहाई से भी कम साफ किया जाता है। इसका मतलब है कि बाकी पानी नदियों, झीलों और जमीन में बह जाता है। मिश्रा बताती हैं कि पानी या गंदे पानी को साफ करने के पारंपरिक तरीकों में तीन चरण होते हैं: शुरुआती या प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक उपचार। शुरुआती उपचार में सिर्फ भारी कणों या तैरते पदार्थों को हटाया जाता है। प्राथमिक उपचार में, पारंपरिक रूप से फिटकरी और फेरस सल्फेट जैसे कौयगुलांट मिलाए जाते हैं जो बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं। मिश्रा कहती हैं, “ये कौयगुलांट गाद बनाते हैं जो टैंक के तल में जम जाता है, जिसे छोड़ने से पहले दोबारा साफ करना पड़ता है। कुछ डेयरी प्लांट गाद को निकालकर जमीन पर फेंक देते हैं, जिससे मिट्टी दूषित होती है और प्रदूषण फैलता है।” भारत 1998 से दूध उत्पादन में दुनिया भर में सबसे आगे है। फिलहाल वैश्विक दूध उत्पादन में भारत का योगदान करीब एक-चौथाई है। अकेले 2024 में देश में 239 मिलियन टन से ज्यादा दूध का उत्पादन हुआ। हालांकि, डेयरी क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण आजीविका की रीढ़ है। लेकिन इससे उद्योग से बड़ी मात्रा में गंदा पानी निकलता है जिस पर चर्चा ना के बराबर होती है। यह ऐसी पर्यावरण संबंधी चुनौती है जिसकी अक्सर अनदेखी की जाती है। अध्ययन बताते हैं कि डेयरी से निकलने वाले गंदे पानी की मात्रा इस उद्योग में प्रसंस्कृत दूध से करीब ढाई गुना है। कच्चे दूध से दही, मक्खन और पनीर जैसी उपभोक्ता वस्तुएं बनाते समय भारी मात्रा में अपशिष्ट जल निकलता है। हालांकि, इस पानी को साफ करने क लिए दशकों से पारंपरिक तरीके अपनाए जा रहे हैं जिसमें रसायनों का इस्तेमाल शामिल है। लेकिन, उनकी लागत और पर्यावरण संबंधी दुष्प्रभाव चिंता बढ़ाते रहे हैं। एनवायरनमेंटल मॉनिटरिंग और असेसमेंट में प्रकाशित एक नए अध्ययन में प्राकृतिक कौयगुलांट का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में सुझाव दिया गया है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका और एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी की सहायक प्रोफेसर लिप्सा मिश्रा कहती हैं, “दुनिया भर में पानी की मांग बढ़ रही है, इसलिए गंदे पानी को इस तरह से साफ करना जरूरी है जिससे पारिस्थितिकी तंत्र साफ-सुथरा रहे और प्रदूषण कम हो।” कुदरती कौयगुलांट के फायदे अपने अध्ययन में मिश्रा और उनकी टीम ने प्राकृतिक कौयगुलांट के रूप में पपीते के बीज, मौसंबी के छिलके, और सहजन के पाउडर का इस्तेमाल किया। पपीते के बीज पानी में प्रदूषकों से चिपक सकते हैं और नीचे बैठ सकते हैं। अध्ययन में बताया गया है कि मौसंबी के छिलके फिर से इस्तेमाल के लिए अहम पोषक तत्व भी प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही, पानी की गुणवत्ता में भी सुधार कर सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि सहजन के जीवाणुरोधी गुण पानी में बैक्टीरिया की बढ़ोतरी को रोकने, पानी की गुणवत्ता में सुधार लाने और पानी से होने वाली बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं। मिश्रा और उनके सहयोगियों ने अध्ययन में बताया कि प्राकृतिक कौयगुलांट पानी के पीएच संतुलन को बनाए रखने के साथ ही जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी), रासायनिक ऑक्सीजन मांग (सीओडी) और गंदगी के स्तर को कम करने में भी मदद करते हैं। उदाहरण के लिए, सहजन सूक्ष्मजीवों के विघटन से होने वाले ऑक्सीजन के नुकसान को रोकता है और बीओडी को कम करने में मदद करता है, जो स्वस्थ जलीय आवासों को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
