दिल्ली की ज़हरीली हवा के पीछे पंजाब की पराली वाली थ्योरी का सच क्या है?
लगता है कि दिल्ली की जहरीली हवा के लिए पराली को कोसना अब न्यू नॉर्मल हो गया है। ये हर साल की रीत सी बन गई है। इस बार दिल्ली में दीवाली के बाद प्रदूषण का रिकॉर्ड टूट गया। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में इसका नंंबर आ गया तो इसका ठीकरा फोड़ने के लिए सिर ढूंढे जाने लगे। फिर हुआ ये कि दीवाली के अगले दिन दिल्ली सरकार के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बाकायदा प्रेस क़ॉन्फ्रेंस करके आरोप लगा दिया कि आम आदमी पार्टी ज़बरदस्ती किसानों के मुँह बांधकर तरन तारन और बठिंडा में पराली जलवा रही है ताकि दिल्ली के अंदर इसका असर हो। वैसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों से इतर अगर डेटा पर नजर दौड़ाएं तो सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के आंकड़े बता रहे हैं कि सर्दियों के सीजन में दिल्ली में जो पॉल्यूशन बढ़ जाता है, उसमें पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के खेतों में जलने वाली पराली का योगदान महज 8.1 परसेंट है। सबसे ज्यादा 51.5% योगदान तो गाड़ियों से निकलने वाले धुएं का है। उसके बाद पड़ोसी जिलों से उत्सर्जन का 34.9% और धूल का 3.7% परसेंट योगदान है। जाहिर है, दिल्ली की हवा खराब करने में पराली का योगदान इतना नहीं है, जितना उसका हौव्वा खड़ा किया जा रहा है और वो भी सिर्फ पंजाब की पराली का जबकि वहां तो इस बार खरीफ की फसल ही चौपट हो गई। असली चैलेंज तो आगे है जब रबी की फसल तैयार होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सरकारें मिलकर प्रदूषण के असली कारणों पर काम नहीं करतीं, तब तक हवा की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।
