Interview: अचानक नहीं बढ़ी दिल्ली में गर्मी, पिछले चार दशक से हो रहा इजाफा, पर्यावरणविद् सुनीता नारायण ने दी बड़ी चेतावनी
आने वाले समय में और तेजी से बढ़ेगा जलवायु परिवर्तन का असर। ग्लोबल नहीं लोकल भी दिख रहा है जलवायु परिवर्तन का असर। जलवायु परिवर्तन की वजह से रात के तापमान में हो रहा इजाफा। देश-दुनिया से लेकर स्थानीय स्तर पर लोग इन दिनों चरम पर मौसमी घटनाओं को करीब से महसूस कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण यह बदलाव जब हमारे-आपके जीवन को सीधे प्रभावित करने लगा है, तो 1980 के दौर में, यानी 44 साल पहले पर्यावरण बचाने व जलवायु परिवर्तन की बात करने वाली एक लड़की का चेहरा याद आता है। यह चेहरा देश के उन गिने-चुने पर्यावरणविदों में शामिल था, जो वैश्विक स्तर पर इस मुद्दे को लेकर जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहे थे। इस लंबी अवधि में उन्होंने पर्यावरण बचाव की अपनी मुहिम को न कभी धीमा पड़ने दिया, न ही कभी अपने तथ्य-कथ्य से पीछे हटीं। वह आज भी कहती हैं आने वाले समय में और तेजी से बढ़ेगा जलवायु परिवर्तन का असर। सचेत होने की जरूरत है। केंद्र सरकार और दिल्ली को आपसी लड़ाई बंद कर कागजी एक्शन प्लान बनाने के बजाय मैदानी स्तर पर काम करना चाहिए। यह हैं सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की महानिदेशक व पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् सुनीता नारायण। मौसम की चुनौतियों से कैसे निपटा जाए, भविष्य को लेकर क्या प्लानिंग की जाए, इन्हीं बिंदुओं पर दिल्ली राज्य ब्यूरो के प्रमुख संवाददाता संजीव गुप्ता ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंशः सवाल: भारत विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है, लेकिन इसकी राजधानी दिल्ली एक दिन की वर्षा भी नहीं झेल पाती। क्या कहेंगी इस पर? जवाब: निश्चित तौर पर यह एक चिंताजनक पहलू है। हर साल मानसून के दौरान दिल्ली की ऐसी ही तस्वीर देखने को मिलती है, लेकिन न कोई पुख्ता एक्शन प्लान बन पाता है और न ही पूर्व वर्षों की पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में कुछ ठोस उपाय किए जाते हैं। इस बार भी यही देखने को मिला। न यमुना की गाद निकाली जाती है, न समय पर नाले साफ होते हैं और न जलभराव रोकने की तैयारी होती है। दिल्ली और केंद्र सरकार आपस में लड़ती रहती हैं तो पिसती इन सबमें जनता है। सवाल: दिल्ली सरकार का कहना है कि मानसून के पहले ही दिन रिकॉर्ड वर्षा हो गई, इसीलिए ऐसी स्थिति बनी? सवाल: समर एक्शन प्लान इस बार बहुत देरी से बना। हीट एक्शन प्लान कागजी रह गया है और क्लाइमेट एक्शन प्लान तो बना ही नहीं है। इस पर क्या कहेंगी? जवाब: समर एक्शन प्लान आधा-अधूरा है। यह वायु प्रदूषण के तात्कालिक कारणों का शमन करने के लिए, भविष्य के लिए नहीं। केवल धूल विरोधी अभियान सीधे वायु गुणवत्ता में सुधार को लक्षित करता है। बहुत से कार्य बिंदु जैसे ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, हरित आवरण बढ़ाना और खुले में जलने से रोकना, पहले से ही राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के अभिन्न अंग हैं और मौसमी क्रियान्वयन के लिए नई रणनीतियां नहीं, बल्कि चल रही प्रथाएं होनी चाहिए। वृक्षारोपण और नगर वनों के विकास जैसी पहल, पर्यावरण की दृष्टि से प्रभावी होते हुए भी तत्काल वायु गुणवत्ता में सुधार नहीं लाती है। इसके चलते दीर्घकालिक पर्यावरणीय लक्ष्यों पर फोकस करना चाहिए। सवाल: क्या हीट एक्शन प्लान कागजी साबित हो रहा है? जवाब: बिल्कुल। दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) द्वारा तैयार यह प्लान अभी भी एक कागजी दस्तावेज ही है। मई-जून में भयंकर लू में भी दिल्ली वासियों को राहत देने के लिए कहीं कोई कदम नहीं उठाए गए। यहां तक कि एलजी ने इस प्लान के आधार पर श्रमिकों को दोपहर 12 से तीन बजे तक ब्रेक देने के आदेश का भी ज्यादातर जगहों पर पालन नहीं ही हुआ। हीट एक्शन प्लान बनाने से पहले न इसके प्रभाव का आकलन किया गया, न कोई अलर्ट सिस्टम विकसित हुआ। हॉटस्पॉट में मुंगेशपुर का नाम तक शामिल नहीं और प्लान के लिए फंड का भी प्रविधान नहीं है। सवाल: इस साल गर्मी कुछ ज्यादा ही नहीं पड़ी? आप इसके पीछे क्या वजह मानती हैं? जवाब: बिल्कुल पड़ी है, लेकिन राजधानी में गर्मी इसी साल एकाएक नहीं बढ़ी है, बल्कि पिछले चार दशकों के दौरान इसमें निरंतर इजाफा हो रहा है। जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम तेजी से बदल रहा है। तापमान ही नहीं, वातावरण में मौजूद नमी में भी तेजी से इजाफा हो रहा है। जलवायु परिवर्तन ने शहर को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा गर्म और नम बना दिया है। इसीलिए दिल्ली में गर्मी के सीजन में बदलाव का अनुभव हो रहा है। दरअसल, पिछले चार देशों में दिल्ली में कंक्रीट का जंगल भी बढ़ा है, जो अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव में भी इजाफा कर रहा है। सन 2000 के बाद दिल्ली में तेजी से विकास कार्य हुए हैं। निर्माण कार्यों में इजाफा हुआ। खाली पड़ी जमीन पर फ्लैटों का निर्माण हुआ है तो हरित क्षेत्र बढ़ाने के नाम पर भी झाड़ियां ज्यादा लगाई गईं, वृक्ष कम। सार्वजनिक परिवहन सेवा बेहतर न होने के कारण सड़कों पर वाहनों की संख्या भी काफी बढ़ गई है। शोधकर्ताओं के मुताबिक इसी के चलते शहर की खुद को ठंडा कर पाने की क्षमता में 12 से 21 प्रतिशत की कमी आई है। सवाल: क्या घर की बनावट और शहर की डिजाइनिंग में बदलाव भी इस स्थिति में फायदेमंद है? जवाब: शहर की भौगोलिक स्थिति और स्थानीय मौसम को भी ध्यान में रखना जरूरी है। खिड़कियों को ओपन स्पेस की तरफ बनाना चाहिए। बिल्डिंग को इस तरह से डिजाइन किया जाना जाए कि अधिक से अधिक फ्लैटों को ओपन स्पेस की तरफ खिड़कियां मिलें। खिड़कियों के साइज भी कमरों के साइज के हिसाब से तय करने होंगे, ताकि कमरों के अंदर की हवा ताजी हवा से बदल सके। सवाल: दिन तो दिन, अब रातों का तापमान भी तेजी से बढ़ रहा है, क्यों? जवाब: इसमें भी जलवायु परिवर्तन की बड़ी भूमिका है, क्योंकि वैश्विक तापमान में लगातार वृद्धि के चलते हवा का तापमान भी बढ़ा है, जिसका दिन और रात के तापमान पर असर पड़ा है। साफ आसमान से रात ठंडी होने का रास्ता भी साफ होता है, लेकिन प्रदूषण में बढ़ोत्तरी या आसमान में बदली छा जाने के कारण लांग वेव रेडिएशन के रूप में धरती द्वारा निकाली जा रही ऊर्जा बादलों और भूतल के बीच फंस जाती है, जिससे तापमान में और भी वृद्धि होती है। सवाल: आपको नहीं लगता कि मानसून की वर्षा का पैटर्न बदल गया है और मौसम चक्र भी धीरे-धीरे बदल रहा है? जवाब: जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से देखने को मिल रहा है। मानसून का पैटर्न भी इसीलिए बदल रहा है। एनसीआर सहित देश भर में लंबे समय से मानसून के मौसम में वर्षा वाले दिनों की संख्या घट रही है। कुछ ही दिनों में रुक-रुक कर भारी से अत्यंत भारी वर्षा हो जाती है। यह पैटर्न बीते कुछ वर्षों से लगातार मजबूत हो रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हवा में नमी अब अधिक रहने लगी है। महासागर भी गर्म है। दक्षिण -पश्चिम मानसून अपने साथ अतिरिक्त नमी ला रहा है। एक अन्य अहम पहलू यह कि बढ़ते तापमान के साथ, हवा में नमी धारण करने की क्षमता भी बढ़ जाती है। चूंकि गर्म हवा लंबे समय तक नमी को धारण नहीं रख सकती, ऐसे में जब भी वर्षा होती है तो सारी नमी कुछ घंटों या कुछ दिनों के अंतराल में बरस जाती है। यही वजह है कि इतने कम समय में इतनी भारी बरसात हो रही है। सवाल: क्या भविष्य में इन सबमें कमी की उम्मीद की जा सकती है या फिर इसमें और इजाफा होगा? जवाब: जलवायु विसंगतियों के प्रभाव से प्रतिकूल मौसम की ऐसी परिस्थितियां बढ़ ही रही हैं। हम इसका व्यापक असर दिल्ली में भी देख रहे हैं। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन और तीव्र होगा, बाढ़, लू और चक्रवात जैसी चरम घटनाएं और गंभीर हो जाएंगी। इन घटनाओं से बढ़ते जोखिमों से निपटने के लिए तत्काल जलवायु कार्रवाई, अनुकूलन उपाय और वैश्विक ग्रीनहाउस गैस कटौती पर सहयोग आवश्यक है। सवाल: ऐसे में बिना पुख्ता प्लानिंग के तो वर्षा का जल भी बर्बाद होता जाएगा। क्या करना चाहिए? जवाब: मानसून के पैटर्न में बदलाव को देखते हुए ज्यादा से ज्यादा तालाब और झील विकसित करने चाहिए। इससे दिल्ली और बेंगलुरु जैसे जल संकट वाले शहरों में वर्षा जल संचयन हो सकेगा और वर्षा का पानी नाली और सड़कों पर बहने से भी बचेगा। जलवायु-परिवर्तन के इस दौर में अच्छी वर्षा तो होगी, लेकिन कम दिनों में। इसका मतलब है कि बाढ़ का प्रबंधन करने की क्षमता महत्वपूर्ण होगी। लंबे समय तक सूखे का सामना भी करना पड़ेगा। यह वही है जो आप आज दिल्ली में देख रहे हैं, जिसका मतलब यह कि जल आपूर्ति प्रणाली को ठीक करना होगा। इस बारे में सोचें कि वर्षा कहां और कब होती है, इसके पानी को कैसे बचाएं। वर्षा जल संचयन पर वापस जाएं। हमें जल निकायों, झीलों, टैंकों और पोखरों की कला को फिर से सीखने की जरूरत है। खासकर आज के जलवायु परिवर्तन के समय में। हमें स्थानीय जल प्रणालियों में निवेश करने के लिए अपने काम को बढ़ाने की जरूरत है, ताकि बारिश की हर बूंद को इकट्ठा किया जा सके। हमें अपनी झीलों और पोखरों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। इसी तरह से जल पुनर्भरण बढ़ेगा। सवाल: क्या कारण है कि देश और दिल्ली में वायु प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है? जवाब: ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वायु प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। पहले से कम भी हुआ है। बढ़ वहीं रहा है जहां ईमानदारी से काम नहीं किया जा रहा। समस्या क्या है कि प्रदूषण समाप्त करने के लिए शब्द और चिट्ठियां नहीं, बल्कि सख्ती चाहिए। मसलन, ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) एक अस्थायी व्यवस्था है। सर्दियों में जब मौसमी वजह से प्रदूषण बहुत अधिक हो जाता है तो उस पर नियंत्रण की प्रक्रिया है, लेकिन अगर उस दौरान स्कूल बंद करने की नौबत आती है तो साल भर ऐसे उपाय करने चाहिए, जिससे कि दोबारा वह हालात नहीं बनें। सवाल: क्या प्रदूषण बढ़ने में भी मौसम की भूमिका है? जवाब: वायु प्रदूषण का स्तर वर्ष भर बढ़ा हुआ रहने के लिए दो प्रमुख कारण हैं। बिगड़ती मौसम की स्थिति, जो मानव नियंत्रण से परे है और संकट से निपटने की धीमी रफ्तार। इस सर्दी में दिल्ली सहित उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा नहीं हुई। वर्षा की कमी पश्चिमी विक्षोभ को प्रभावित करने वाले आर्कटिक जेट स्ट्रीम में बदलाव के कारण है, जो अधिक अनियमित हो रही है और उत्तर की ओर बढ़ रही है। इसके कारण पहाड़ों पर कम बर्फबारी हुई और दिल्ली में कम बारिश हुई, जिसके परिणामस्वरूप प्रदूषण का स्तर बढ़ गया। दूसरी बात 2021 तक की गई सभी कार्रवाइयों के बाद, हम उस गति से कार्रवाई नहीं कर रहे हैं जो संकट से निपटने के लिए आवश्यक है। दिल्ली में बस बेड़े का आखिरी बड़ा विस्तार मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल के दौरान राष्ट्रमंडल खेलों के आसपास हुआ था। तब से, कई बसों को प्रतिस्थापित नहीं किया गया है, जिससे बस सवारियों में गिरावट आई है। बस प्रणाली को प्रभावी बनाने के लिए मेट्रो सिस्टम और पार्किंग सुविधाओं के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है। सवाल: आंकड़ों की बाजीगरी छोड़ दें तो क्या वाकई दिल्ली की स्थिति में सुधार कहा जा सकता है? जवाब: हां, बिल्कुल, सुधार नजर आता है। सर्दी छोड़कर बाकी के दिनों में प्रदूषण कम हो रहा है। संतोषजनक और मध्यम श्रेणी के दिनों की संख्या बढ़ रही है, गंभीर और बहुत खराब श्रेणी वाले दिन घट रहे हैं। अब अगर मौसमी कारणों से एक्यूआइ बढ़ता है तो उसमें वाकई कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन हमें अपनी प्लानिंग इसी तरह बनानी चाहिए कि प्रतिकूल मौसम में हालात अनुकूल ही बने रहें। सवाल: आपको क्या लगता है कि राज्य और केंद्र सरकार वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए वाकई गंभीर हैं? जवाब: बिल्कुल, राज्य और केंद्र सरकार प्रदूषण की रोकथाम के लिए आज गंभीर तो हैं, इसमें कोई शक नहीं। इसी के तहत ई वाहनों पर फोकस किया जा रहा है और पराली प्रबंधन पर भी लगातार काम हो रहा है। सवाल: आपके हिसाब से क्या करना चाहिए प्रदूषण की रोकथाम के लिए? जवाब: प्रयास हो रहे हैं, लेकिन उन्हें लगातार करने की जरूरत है। प्रदूषण बढ़ने पर ही नहीं, प्रदूषण न बढ़े, इसके लिए भी कदम उठाए जाने चाहिए। प्रदूषण के स्रोत पता करने के लिए अध्ययन करने या कराने की बात कहना भी बहानेबाजी है। स्रोत सभी का पता हैं, इसमें कोई विज्ञान नहीं है। सार्वजनिक परिवहन को विश्वसनीय बनाना होगा। पराली का समाधान इसे राजनीतिक मुददा बनाए बगैर करना होगा। इसके अलावा राजनीतिक दलों को वायु प्रदूषण का मुददा भी अपने एजेंडे में शामिल करना चाहिए।
