Report: जलवायु संकट की मार झेल रही खेती... बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और ओलावृष्टि से किसानों की बढ़ी चिंता
भारत की कृषि आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां मौसम का बदलता मिजाज किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। कभी असमय बारिश, कभी भीषण गर्मी, तो कभी ओलावृष्टि और बाढ़, चरम मौसम की घटनाएं खेती की लागत बढ़ाने और उत्पादन घटाने का कारण बन रही हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में देश 99 प्रतिशत दिनों तक किसी न किसी चरम मौसम घटना से प्रभावित रहा, जिसका सीधा असर किसानों, फसलों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा। खेती के लिए खतरे की घंटी बना बढ़ता तापमान रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 भारत का आठवां सबसे गर्म वर्ष रहा। औसत तापमान सामान्य से 0.28 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। बढ़ती गर्मी का सबसे अधिक असर गेहूं, धान, दलहन और तिलहन जैसी फसलों पर पड़ रहा है। अधिक तापमान के कारण फसलों की वृद्धि अवधि कम हो रही है और उत्पादन में गिरावट का खतरा बढ़ रहा है। मार्च-अप्रैल बन रहे किसानों के लिए सबसे जोखिम भरे महीने विशेषज्ञों के अनुसार, मार्च और अप्रैल का समय अब किसानों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है। इस दौरान तापमान तेजी से बढ़ रहा है, असमय बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं, ओलावृष्टि का दायरा विस्तृत हो रहा है, फसलों में रोग और कीटों का प्रकोप बढ़ रहा है। इन परिस्थितियों में गेहूं, आम, सब्जियों और दलहनी फसलों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। 1.74 करोड़ हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित सीएसई की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में चरम मौसम की घटनाओं के कारण 1.74 करोड़ हेक्टेयर से अधिक फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ। कई राज्यों में बाढ़, सूखा और अत्यधिक वर्षा के कारण किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। विशेष रूप से धान, गेहूं, मक्का, कपास और बागवानी फसलों पर इसका असर देखा गया। भूजल संकट बढ़ा रहा खेती की मुश्किलें खेती के लिए पानी की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। जितना पानी निकाला जा रहा है, उतना पुनर्भरण नहीं हो पा रहा। इसका असर सिंचाई लागत पर पड़ रहा है और किसान महंगे जल स्रोतों पर निर्भर होते जा रहे हैं। कटते जंगल और बिगड़ता कृषि संतुलन वन क्षेत्र में लगातार कमी आने से स्थानीय जलवायु प्रभावित हो रही है। इससे वर्षा का पैटर्न बदल रहा है, मिट्टी की नमी घट रही है और कृषि क्षेत्र में जल संकट बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों का संरक्षण खेती और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए जरूरी है। जलवायु अनुकूल खेती की जरूरत विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते मौसम के दौर में किसानों को जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकों को अपनाना होगा। इनमें सूखा और बाढ़ सहनशील फसल, किस्मों का उपयोग, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, वर्षा जल संचयन, प्राकृतिक और जैविक खेती, फसल विविधीकरण और कृषि वानिकी शामिल हैं। किसानों के लिए चेतावनी और अवसर दोनों जलवायु परिवर्तन खेती के लिए बड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन वैज्ञानिक खेती और बेहतर जल प्रबंधन के जरिए इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। यदि समय रहते जल संरक्षण, मिट्टी संरक्षण और जलवायु अनुकूल कृषि पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
