प्राकृतिक उर्वरकों की गुणवत्ता का रहे ध्यान, कीमत हो कम
प्राकृतिक उर्वरकों के पर्याप्त उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार को ठोस उपाय करने होंगे। ये उर्वरक न केवल उच्च गुणवत्ता वाले हों, बल्कि उनमें ज्यादा पैदावार के लिए रासायनिक उर्वरकों जितनी क्षमता भी हो। सरकार को फसल-विविधीकरण को बढ़ावा देना होगा। यदि सरकार उपज के लिए आकर्षक एमएसपी की गारंटी देती है तो मक्का, बाजरा, दूसरे मोटे अनाज समेत अन्य फसलों का रकबा भी बढ़ेगा। किसानों को कम कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराने और उनकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए पीएम-प्रणाम (प्रधानमंत्री- प्रमोशन ऑफ अल्टरनेटिव न्यूट्रिएंट्स फॉर एग्रीकल्चर मैनेजमेंट) योजना शुरू करने का विचार उपयोगी है। इसका उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों की जगह कृषि पारिस्थितिकी आधारित उर्वरकों को बढ़ावा देना है। पैदावार बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी के प्राकृतिक पोषक तत्त्व नष्ट हुए हैं। हरित क्रांति वाले तीन राज्यों यथा पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बड़े इलाकों की मिट्टी ऐसे कमजोर इंसान जैसी हो गई है, जो अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए स्टेरॉयड का इस्तेमाल करता है। ऐसा इंसान जिन्दगी तो जी रहा है, पर भीतर से खोखला हो रहा है। इसी तरह मृदा की उत्पादन क्षमता घट रही है। अन्य राज्यों की मृदा की स्थिति भी ऐसी ही हो रही है। हालांकि, पीएम-प्रणाम के क्रियान्वयन की राह आसान नहीं है। पहली बात, बजट में इसके लिए अलग से धन का आवंटन नहीं किया गया है। धन की व्यवस्था केंद्र सरकार द्वारा किसानों को रासायनिक उर्वरक पर दी जाने वाली सब्सिडी की मात्रा को कम करके की जानी है। राज्य सरकारों से अपेक्षा की गई है कि वे सब्सिडी राशि कम करने के लिए किसानों को प्राकृतिक उर्वरक के इस्तेमाल की ओर प्रेरित करें। केन्द्र सरकार वैकल्पिक उर्वरकों को बढ़ावा देने और इसके लिए किसानों में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए सब्सिडी बचत का 50 फीसदी राज्यों को अनुदान के रूप में आवंटित करेगी। क्या राज्य सरकारें वैकल्पिक उर्वरक के इस्तेमाल के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर पाएंगी? अब तक का रेकॉर्ड खराब रहा है। प्रमुख पारिस्थितिक थिंक-टैंक, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने एक अध्ययन में पाया था कि वैकल्पिक उर्वरक क्षेत्र उपेक्षित, असंगठित और अनियमित है। राज्य सरकारें अधिकांश बजट का इस्तेमाल नहीं कर रही हैं, जो केन्द्र सरकार उन्हें ऑर्गेनिक और जैव उर्वरकों को बढ़ावा देने के लिए आवंटित करती है। वैकल्पिक उर्वरक का उत्पादन भी कम है। यहां तक कि उसकी गुणवत्ता भी अप्रमाणित है। गुणवत्ता नियंत्रण के लिए बुनियादी ढांचा खराब है। ज्यादातर राज्यों के पास अपनी परीक्षण प्रयोगशालाएं तक नहीं हैं। आठ राज्यों के पास अपनी प्रयोगशालाएं तो हैं, पर वे अपनी क्षमता का समुचित इस्तेमाल नहीं कर रही हैं। सात क्षेत्रीय जैविक कृषि केंद्रों की प्रयोगशालाओं की क्षमता का 2019-20 में एक तिहाई से भी कम इस्तेमाल हुआ। किसानों को नकली 'प्राकृतिक उर्वरक' भी बेचा जा रहा है। ऐसे में प्राकृतिक उर्वरकों पर से उनका भरोसा कम हो रहा है। पहली बात, प्राकृतिक उर्वरक ऐसा हो जो मृदा का स्वास्थ्य बढ़ाए। दूसरा, उत्पादन लागत में कमी हो। तीसरा, उन्हें उतनी ही आय हो जितनी उन्हें रासायनिक उर्वरक के इस्तेमाल से होती है। प्राकृतिक उर्वरकों के पर्याप्त उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार को ठोस उपाय करने होंगे। ये उर्वरक न केवल उच्च गुणवत्ता वाले हों, बल्कि उनमें ज्यादा पैदावार के लिए रासायनिक उर्वरकों जितनी क्षमता भी हो। सरकार को फसल-विविधीकरण को बढ़ावा देना होगा। यदि सरकार उपज के लिए आकर्षक एमएसपी की गारंटी देती है तो मक्का, बाजरा, दूसरे मोटे अनाज समेत अन्य फसलों का रकबा भी बढ़ेगा।
