दिल्ली-एनसीआर से लाखों लोग जाएंगे बाहर? सीजेआई सूर्यकांत के सामने आया 300 किलोमीटर वाला कौन सा प्रस्ताव...
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, NCR में हजारों की संख्या में ऐसी इकाइयां हैं जो अभी भी कोयले या अवैध ईंधन का उपयोग कर रही हैं. यदि सुप्रीम कोर्ट के प्रस्ताव के तहत 300 किलोमीटर के दायरे से इन उद्योगों को हटाया या बदला जाता है, तो इससे न केवल बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा, बल्कि लाखों कामगारों की आजीविका और स्थानीय सप्लाई चेन पर भी गहरा असर पड़ेगा. सीजेआई सूर्यकांत के सामने ऐसा प्रस्ताव पेश किया गया है, जो अगर लागू हो गया तो दिल्ली-एनसीआर से हजारों फैक्टरियां 300 किलोमीटर दूर भेज दी जाएंगी. अगर ऐसा हुआ तो उनमें काम कर रहे 6 से 7 लाख लोगों पर भी असर होगा. दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के जानलेवा स्तर से निपटने के लिए अब एक बेहद सख्त और बड़ा कदम उठाने की तैयारी शुरू हो गई है. सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक ऐसा प्रस्ताव पेश किया गया, जो अगर लागू हुआ तो कोयले से चलने वाली सारी फैक्टरियां दिल्ली-एनसीआर से बाहर कर दी जाएंगी. इतना ही नहीं, 300 किलोमीटर के दायरे में कोई थर्मल पावर प्लांट नहीं होगा. अगर ऐसा हुआ तो इनमें काम कर रहे लाखों लोगों को वहां जाना होगा. सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने इस प्रस्ताव पर केंद्र सरकार के मंत्रालयों से जवाब मांगा है, जिससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों के दिन अब लदने वाले हैं. 300 किलोमीटर का दायरा और थर्मल पावर प्लांट पर रोक एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन की ओर से सुझाए गए उपायों पर सुनवाई करते हुए सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कई कड़े निर्देश दिए हैंः कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय, पेट्रोलियम मंत्रालय और विद्युत मंत्रालय से उस सुझाव पर जवाब मांगा है, जिसमें कहा गया है कि दिल्ली के 300 किलोमीटर के दायरे में अब कोई भी नया कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट नहीं लगाया जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान सरकार को निर्देश दिया गया है कि वे सार्वजनिक नोटिस जारी कर कोयला आधारित उद्योगों से उनके सुझाव और आपत्तियां मांगें. इन राज्यों को एक एक्शन टेकन प्लान भी जमा करना होगा. कोयले की जगह कौन सा विकल्प? अदालत ने केवल फैक्ट्रियों को हटाने की ही बात नहीं की है, बल्कि उनके भविष्य पर भी विचार करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालयों से एक ज्वाइंट प्रपोजल मांगा है. एनसीआर के उन उद्योगों की पहचान करना जो पूरी तरह कोयले पर निर्भर हैं. यह तय करना कि इन उद्योगों को कोयले के विकल्प के रूप में कौन सा अल्टरनेटिव फ्यूल दिया जा सकता है. धूल और वाहनों पर भी चलेगा हंटर कोयले के अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर भी सख्त रुख अपनाया है. 12 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में अदालत वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण के मुद्दे की विस्तार से जांच करेगी.कोर्ट ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि वह CAQM द्वारा सुझाए गए दीर्घकालिक समाधानों को लागू करने के लिए एक ठोस एक्शन प्लान पेश करे. सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को अपनी रिपोर्ट और प्रस्ताव जमा करने के लिए 12 मार्च तक का समय दिया है. यदि यह प्रस्ताव मंजूर हो जाता है, तो दिल्ली से 300 किलोमीटर दूर तक के औद्योगिक इलाके पूरी तरह बदल जाएंगे और कोयले का धुआं छोड़ने वाली फैक्ट्रियों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना होगा. कितनी फैक्टरियां और कितने कामगार विभिन्न औद्योगिक रिपोर्टों और आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार, दिल्ली में लगभग 25,000 से 30,000 ऐसी फैक्ट्रियां हैं जो इंडस्ट्रियल इलाकों में चल रही हैं. जबकि अनधिकृत क्षेत्रों में यह संख्या लाखों में हो सकती है. अकेले दिल्ली-NCR के कोयला आधारित और प्रदूषणकारी उद्योगों में करीब 5 से 7 लाख श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, NCR में हजारों की संख्या में ऐसी इकाइयां हैं जो अभी भी कोयले या अवैध ईंधन का उपयोग कर रही हैं. यदि सुप्रीम कोर्ट के प्रस्ताव के तहत 300 किलोमीटर के दायरे से इन उद्योगों को हटाया या बदला जाता है, तो इससे न केवल बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा, बल्कि लाखों कामगारों की आजीविका और स्थानीय सप्लाई चेन पर भी गहरा असर पड़ेगा.
