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Varanasi tops cities in cutting PM10 levels, says govt; CSE flags city-based approach

Ninety-five out of 132 polluted cities identified under a national programme on clean air have shown improvement in air quality by reducing particulate matter (PM10) concentration in 2021-22 compared to 2017, with Varanasi recording the highest 53% reduction in the level of hazardous pollutant during the period, claimed the government in its analysis, even as the green thinktank Centre for Science and Environment (CSE) has flagged limitations of such city-based approach. The analysis found that 20 of the 95 cities, including Chennai, Madurai, Nashik and Chittur, have even conformed to the National Ambient Air Quality Standards (NAAQS) that put acceptable annual average limit of PM10 at 60 micrograms per cubic meter (µg/m3). air qua (1) The analysis, done by the environment ministry, has, however, not factored in the other fine and more hazardous particulate matter, PM2. 5, for the sake of uniformity as only PM10 is monitored in all 132 cities. Under the national clean air programme (NCAP), the ministry has set targets of 20-30% reduction in particulate matter concentration by 2024 from 2017 levels across the country. Only 43 NCAP cities have adequate PM2. 5 data for the period 2019-2021. Besides Varanasi that reported the biggest improvement, the other cities thathave shown improvement in PM10 levels during that period include Delhi, Mumbai, Kolkata, Bengaluru, Hyderabad, Noida, Ghaziabad, Lucknow, Kanpur, Agra, Pune, Nagpur and Chandigarh. The PM10 concentration in most of the cities, however, continues to be figured at much higher levels than the targets as well as the NAAQS limit despite showing improvement. For example, in Delhi, the PM10 level reduced from 241µg/m3 in 2017 to 196 µg/m3 in 2021-22 — a reduction of 18%, but it is more than three times of the acceptable limit of 60 µg/m3. In Mumbai, the PM10 level reduced from 151µg/m3 in 2017 to 106 µg/m3 in 2021-22. In Kolkata, it reduced from 119 µg/m3 in 2017to 105 µg/m3 in 2021-22. The CSE warned that the existing clean air action plans that draw hard boundaries around cities for the clean-up job are failing to address the major pollution sources in the larger orbit. “The science of regional influence of pollution has begun to take shape in India. The NCAP has taken on board the principle of regional air quality management. But there is no regulatory framework to enable multi-jurisdiction management for aligned action and to establish the upwind and downwind responsibilities of state governments to improve regional air quality,” said Anumita Roychowdhury, executive director, CSE.

Varanasi tops cities in cutting PM10 levels, says govt; CSE flags city-based approach

Ninety-five out of 132 polluted cities identified under a national programme on clean air have shown improvement in air quality by reducing particulate matter (PM10) concentration in 2021-22 compared to 2017, with Varanasi recording the highest 53% reduction in the level of hazardous pollutant during the period, claimed the government in its analysis, even as the green thinktank Centre for Science and Environment (CSE) has flagged limitations of such city-based approach. The analysis found that 20 of the 95 cities, including Chennai, Madurai, Nashik and Chittur, have even conformed to the National Ambient Air Quality Standards (NAAQS) that put acceptable annual average limit of PM10 at 60 micrograms per cubic meter (µg/m3). The analysis, done by the environment ministry, has, however, not factored in the other fine and more hazardous particulate matter, PM2. 5, for the sake of uniformity as only PM10 is monitored in all 132 cities. Under the national clean air programme (NCAP), the ministry has set targets of 20-30% reduction in particulate matter concentration by 2024 from 2017 levels across the country. Only 43 NCAP cities have adequate PM2. 5 data for the period 2019-2021. Besides Varanasi that reported the biggest improvement, the other cities thathave shown improvement in PM10 levels during that period include Delhi, Mumbai, Kolkata, Bengaluru, Hyderabad, Noida, Ghaziabad, Lucknow, Kanpur, Agra, Pune, Nagpur and Chandigarh. The PM10 concentration in most of the cities, however, continues to be figured at much higher levels than the targets as well as the NAAQS limit despite showing improvement. For example, in Delhi, the PM10 level reduced from 241µg/m3 in 2017 to 196 µg/m3 in 2021-22 — a reduction of 18%, but it is more than three times of the acceptable limit of 60 µg/m3. In Mumbai, the PM10 level reduced from 151µg/m3 in 2017 to 106 µg/m3 in 2021-22. In Kolkata, it reduced from 119 µg/m3 in 2017to 105 µg/m3 in 2021-22. The CSE warned that the existing clean air action plans that draw hard boundaries around cities for the clean-up job are failing to address the major pollution sources in the larger orbit. “The science of regional influence of pollution has begun to take shape in India. The NCAP has taken on board the principle of regional air quality management. But there is no regulatory framework to enable multi-jurisdiction management for aligned action and to establish the upwind and downwind responsibilities of state governments to improve regional air quality,” said Anumita Roychowdhury, executive director, CSE.

कोरोना संकट के बाद महानगरों में तेजी से बढ़ा वायु प्रदूषण, दिल्ली और मुंबई के बीच 4 गुना का अंतर

कोविड संकट के बाद देश के प्रमुख महानगरों में तेजी से प्रदूषण बढ़ा है। दिल्ली में यह वृद्धि 13 प्रतिशत तक है, जबकि मुंबई में सर्वाधिक 48 प्रतिशत तक है। केवल एक चेन्नई ही ऐसा शहर है जहां कोविड के बाद प्रदूषण के स्तर में गिरावट हुई है।यह जानकारी सामने आई है सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) के एक विश्लेषण में। ''इंटरनेशनल डे आफ क्लीन एयर फार ब्लू स्काई पर जारी की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश भर में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु प्रोग्राम (एनसीएपी) में शामिल और इसमें नहीं शामिल शहरों में स्थिति लगभग एक जैसी है। इन दोनों ही श्रेणियों के शहरों में प्रदूषण के स्तर में खास अंतर नहीं आया है। इसके साथ ही यह भी बताया गया है कि देश के सभी प्रमुख महानगरों में कोविड के दौरान यानी वर्ष 2020 में लागू पाबंदियों के चलते प्रदूषण के स्तर में कमी आई थी। वहीं, कड़े प्रतिबंधों के समाप्त होते ही स्थिति लगभग पहले जैसी ही हो गई है। मुंबई में तेजी से बढ़ा प्रदूषण इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2019 की तुलना में दिल्ली में वर्ष 2020 में प्रदूषण के स्तर में 13 प्रतिशत की गिरावट आई थी। लेकिन वर्ष 2021 में फिर से 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई। यानी स्थिति पहले के स्तर पर ही पहुंच गई। अन्य महानगरों की बात करें तो मुंबई में कोविड के बाद प्रदूषण के स्तर में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी हुई है। मुंबई में वर्ष 2019 में प्रदूषक कण पीएम 2.5 का वार्षिक स्तर 30 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रहा था। कोविड के समय इसमें सुधार हुआ और यह स्तर 23 पर आ गया। लेकिन 2021 में यह स्तर बढ़कर 34 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पर पहुंच गया। यानी इसमें 48 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। यह महानगरों में सबसे ज्यादा वृद्धि है। रिपोर्ट बताती है कि देश के बड़े शहरों में केवल चेन्नई शहर ऐसा है जहां पर कोविड के बाद प्रदूषण में कमी दर्ज की गई है। चेन्नई में वर्ष 2019 में पीएम 2.5 का वार्षिक औसत 45 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रहा था। जबकि, वर्ष 2020 में यह स्तर घटकर 33 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पर आ गया। बता दें कि वर्ष 2021 में जहां सभी शहरों में प्रदूषण के स्तर में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन, चेन्नई एकमात्र ऐसा शहर है जहां पर प्रदूषण के स्तर में 23 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसके पीछे अच्छी बारिश और मौसम के कारकों को ज्यादा जिम्मेदार माना जा रहा है।

Ghaziabad News: क्या है गाजियाबाद की समस्या, क्यों लोगों का जीना हो गया बेहाल

गाजियाबाद के लिए बुरी खबर है. यह जिला उत्तर भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने साल 2021 के लिए PM2.5 के आधार पर प्रदूषण का अध्ययन किया तो गाजियाबाद की यह रिपोर्ट सामने आई. इस अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बाई-पास सड़क का अधूरा निर्माण और ट्रैफिक प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह है. बाइपास रोड के 20 प्रतिशत हिस्से का निर्माण नहीं होने से स्थानीय निवासियों को राजनगर एक्सटेंशन और मेरठ रोड के बीच भारी जाम की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. गौरतलब है कि यहां यातायात की गति भी धीमी है. इस वजह से भी इस क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर ज्यादा है. स्थानीय आरडब्ल्यूए स्थानीय अधिकारियों के संपर्क में है, लेकिन सड़क के इस छोटे से हिस्से को पूरा करने की प्रगति बहुत धीमी है. जीडीए ने पहले ही इस भूमि का अधिग्रहण कर लिया था. उसने बाई-पास सड़क का 80% निर्माण भी कर लिया है. एडीएम (एलए) भूमि अधिग्रहण पुनर्वास और पुनर्वास अधिनियम 2013 के तहत, धारा 11 (1) के तहत खंड 3 के अनुसार भूमि अधिग्रहण पर काम कर रहा है, लेकिन बहुत धीमी गति से. इसी के चलते यहा लोगों को ट्रैफिक और वायु प्रदूषण से समस्या हो रही है. लोगों ने बताई असल समस्या सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुमिता राय चौधरी ने News 18 से कहा कि pm 2.5 के कर्ण इतने छोटे होते हैं कि यह दिखते नहीं हैं. लेकिन, सांस के साथ घुल कर यह बहुत नुकसान देते हैं. आस पास के सोसायटी के लोगों ने News 18 से कहा कि यहां सबसे बड़ी समस्या है प्रदूषण, ट्रैफिक और यहां का कूड़ा है. जो काम पूरा नहीं हुआ उसकी मिट्टी भी यहां मिलेगी. इस वजह से लोगों को बड़ी समस्या हो रही है. लोगों ने कहा हम लोग कई बार जीडीए के पास जा चुके हैं. जब तक यह 20 फीसदी निर्माण नहीं होता, तब तक ऐसे ही समस्या रहेगी. जल्द से जल्द इसका समाधान किया जाए.

Air Pollution: प्रदूषण पर नाकाम दिखीं कोशिशें, करोड़ों खर्च करने के बाद भी नहीं आया कोई सुधार

Centre for Science and Environment की नई रिपोर्ट ने लोगों को चौंका कर रख दिया है. नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (National Clean Air Program-NCAP) के तहत जिन शहरों को चुना गया था इस रिपोर्ट के अनुसार NCAP शहरों और अन्य शहरों की एयर क्वालिटी में कोई खास फर्क नहीं पाया गया. National Clean Air Program: स्वच्छ भारत अभियान के बाद साल 2019 में वायु की गुणवत्ता में सुधार के लिए नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) शुरू किया गया था. इस प्रोग्राम के तहत देश के 132 शहरों में हवा के स्तर को सुधारने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन 3 साल पूरे होने के बाद भी कुछ खास काम नहीं हो पाया. जिन शहरों को इस प्रोग्राम के तहत चुना गया था, उनमें और बाकी शहरों के हवा की गुणवत्ता में कुछ खास फर्क नहीं आया है. 82 शहरों को NCAP के तहत मिला फंड नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत जिन 132 शहरों को चुना गया था, उनमें से 82 शहरों को NCAP के तहत फंडिंग की गई थी. वहीं 50 शहरों को 15वें वित्त आयोग ने फंड से दिया गया था. एनसीएपी (NCAP) के लिए साल 2021-22 तक करीब 6.5 हजार करोड़ रुपये जारी हुए और साल 2022-23 में इस प्रोग्राम के लिए करीब 2.3 हजार करोड़ रुपये जारी होंगे. साल 2020–21 से शहरों में हवा की गुणवत्ता में सुधार कि मात्रा निर्धारित करने की आवश्यकता है, इसके लिए PM 10 के वार्षिक औसत में 15 प्रतिशत कमी आनी चाहिए और अच्छी हवा के दिन 200 से ज्यादा होने चाहिए. इससे कम सुधार होने पर फंडिंग को भी कम कर दिया जाएगा. लॉकडाउन का हवा की गुणवत्ता पर प्रभाव

Ghaziabad News: What is the problem of Ghaziabad, why people’s lives have become miserable

New Delhi/Ghaziabad. Bad news for Ghaziabad. This district has become one of the most polluted cities in North India. When the Center for Science and Environment (CSE) studied pollution on the basis of PM2.5 for the year 2021, this report of Ghaziabad came out. In this study it has been revealed that incomplete construction of by-pass road and traffic pollution is the biggest reason. Due to non-construction of 20 percent of the bypass road, the local residents are facing the problem of heavy traffic jam between Rajnagar Extension and Meerut Road. It is worth noting that the speed of traffic here is also slow. Because of this also the level of pollution in this area is high. The local RWA is in touch with the local authorities, but the progress on completing this small stretch of road is very slow. GDA had already acquired this land. He has also constructed 80% of the by-pass road. ADM (LA) is working on land acquisition as per clause 3 u/s 11(1) under the Land Acquisition Rehabilitation and Rehabilitation Act 2013, but at a very slow pace. Due to this people are facing problems due to traffic and air pollution. people told the real problem Anumita Roy Choudhury, executive director of the Center for Science and Environment (CSE), told Newsbuzz that the ears of pm 2.5 are so small that they are not visible. But, by mixing with the breath, it causes a lot of damage. The people of the surrounding society told News 18 that the biggest problem here is pollution, traffic and the garbage here. The soil of the work which was not completed will also be found here. Because of this people are facing big problems. People said that we have gone to GDA many times. Till this 20 per cent construction is not done, the problem will remain like this. It should be resolved as soon as possible.

Ghaziabad News: क्या है गाजियाबाद की समस्या, क्यों लोगों का जीना हो गया बेहाल

New Delhi News: गाजियाबाद की जनता प्रदूषण और ट्रैफिक से वैसे ही बेहाल थी, कि एक ओर रिपोर्ट ने उनका तनाव बढ़ा दिया है. दरअसल, बुरी खबर यह है कि गाजियाबाद उत्तर भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने साल 2021 के लिए PM2.5 के आधार पर प्रदूषण का अध्ययन किया. इस अध्ययन में पता चला कि गाजियाबाद में प्रदूषण से जनता बेहाल है. यहां के रहवासी बाई-पास सड़क के अधूरे निर्माण और ट्रैफिक की वजह से प्रदूषित माहौल में रहने को मजबूर हैं.

सीएसई की चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई ,गाजियाबाद सबसे प्रदूषित शहर

गाजियाबाद के लिए बुरी खबर है. यह जिला उत्तर भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने साल 2021 के लिए PM2.5 के आधार पर प्रदूषण का अध्ययन किया तो गाजियाबाद की यह रिपोर्ट सामने आई. इस अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बाई-पास सड़क का अधूरा निर्माण और ट्रैफिक प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह है. बाइपास रोड के 20 प्रतिशत हिस्से का निर्माण नहीं होने से स्थानीय निवासियों को राजनगर एक्सटेंशन और मेरठ रोड के बीच भारी जाम की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. गौरतलब है कि यहां यातायात की गति भी धीमी है. इस वजह से भी इस क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर ज्यादा है. स्थानीय आरडब्ल्यूए स्थानीय अधिकारियों के संपर्क में है, लेकिन सड़क के इस छोटे से हिस्से को पूरा करने की प्रगति बहुत धीमी है. जीडीए ने पहले ही इस भूमि का अधिग्रहण कर लिया था. उसने बाई-पास सड़क का 80% निर्माण भी कर लिया है. एडीएम (एलए) भूमि अधिग्रहण पुनर्वास और पुनर्वास अधिनियम 2013 के तहत, धारा 11 (1) के तहत खंड 3 के अनुसार भूमि अधिग्रहण पर काम कर रहा है, लेकिन बहुत धीमी गति से. इसी के चलते यहा लोगों को ट्रैफिक और वायु प्रदूषण से समस्या हो रही है लोगों ने बताई असल समस्या सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुमिता राय चौधरी ने से कहा कि pm 2.5 के कर्ण इतने छोटे होते हैं कि यह दिखते नहीं हैं. लेकिन, सांस के साथ घुल कर यह बहुत नुकसान देते हैं. आस पास के सोसायटी के लोगों ने कहा कि यहां सबसे बड़ी समस्या है प्रदूषण, ट्रैफिक और यहां का कूड़ा है. जो काम पूरा नहीं हुआ उसकी मिट्टी भी यहां मिलेगी. इस वजह से लोगों को बड़ी समस्या हो रही है. लोगों ने कहा हम लोग कई बार जीडीए के पास जा चुके हैं. जब तक यह 20 फीसदी निर्माण नहीं होता, तब तक ऐसे ही समस्या रहेगी. जल्द से जल्द इसका समाधान किया जाए.

सीएसई की अरबन लैब रिपोर्ट:उज्जैन में 8% बढ़ा प्रदूषण, औद्योगिक शहर पीथमपुर-मंडीदीप में और खराब हुई हवा

केंद्र सरकार के नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) में शामिल होने के बावजूद प्रदेश के सबसे बड़े तीर्थ क्षेत्र उज्जैन शहर की हवा दो साल में पहले से और ज्यादा प्रदूषित हो गई है। 2019 की तुलना में 2021 में शहर की हवा में पीएम-2.5 का स्तर 8 फीसदी बढ़ा हुआ पाया गया। इसके अलावा प्रदेश के औद्योगिक शहर सतना में 26 फीसदी और पीथमपुर में 18 फीसदी पीएम-2.5 का डस्ट पॉल्यूशन बढ़ गया है। मंडीदीप में पिछले दो साल में पीएम-2.5 के स्तर में बढ़ोतरी हुई है। सिंगरौली की हालत पहले से खराब है, जहां प्रदूषण का स्तर जस का तस बना हुआ है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरोमेंट की इकाई अरबन लैब की 7 सितंबर को जारी एक रिपोर्ट में यह तस्वीर सामने आई है। जिसमें भारत के औद्योगिक और कस्बाई शहरों की हवा में पीएम-2.5 के स्तर में बदलाव का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम का सकारात्मक असर देवास शहर में नजर आया है, यहां 2019 की तुलना में 2021 में हवा में सालाना औसत पीएम-2.5 का स्तर 6 फीसदी कम पाया गया है। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम में शामिल हैं मप्र के 7 शहर सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) में देश के नागरिकों को सांस लेने के लिए प्रदूषण मुक्त स्वच्छ हवा उपलब्ध कराना भी शामिल हैं। इसलिए केंद्र सरकार ने 2019 में देशभर के 103 नॉन अटेनमेंट शहरों को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम में शामिल किया था। इन शहरों को पिछले 2 साल से हवा साफ करने के लिए केंद्रीय ग्रांट दी जा रही है। नॉन अटेनमेंट सिटीज उन्हें कहा गया, जिनमें 2019 से पहले लगातार पांच वर्ष तक परिवेशीय हवा में पीएम-10, पीएम-2.5 और नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड का स्तर वायु गुणवत्ता मानकों से अधिक बना हुआ था। मप्र में ऐसे 7 शहर हैं, जिनमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, देवास, सागर और उज्जैन शामिल हैं। जिन्हें केंद्र सरकार हर साल धूल और धुआं कम करने के लिए 50 से 100 करोड़ तक ग्रांट दे रही है। केरल का कोझीकोड और कर्नाटक का मडिखेरी में सबसे कम प्रदूषण विश्लेषण के मुताबिक नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम से बाहर वाले 16 शहर ही वायु गुणवत्ता के राष्ट्रीय मानकों को पूरा करते हैं, जिनमें से 13 शहर दक्षिण भारत के हैं। जबकि 103 नॉन अटेनमेंट शहरों में से सबसे कम प्रदूषण केरल के कोझीकोड और कर्नाटक के मडिकेरी शहर में हैं।

Ghaziabad News: क्या है गाजियाबाद की समस्या, क्यों लोगों का जीना हो गया बेहाल

गाजियाबाद के लिए बुरी खबर है. यह जिला उत्तर भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने साल 2021 के लिए PM2.5 के आधार पर प्रदूषण का अध्ययन किया तो गाजियाबाद की यह रिपोर्ट सामने आई. इस अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बाई-पास सड़क का अधूरा निर्माण और ट्रैफिक प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह है. बाइपास रोड के 20 प्रतिशत हिस्से का निर्माण नहीं होने से स्थानीय निवासियों को राजनगर एक्सटेंशन और मेरठ रोड के बीच भारी जाम की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. गौरतलब है कि यहां यातायात की गति भी धीमी है. इस वजह से भी इस क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर ज्यादा है. स्थानीय आरडब्ल्यूए स्थानीय अधिकारियों के संपर्क में है, लेकिन सड़क के इस छोटे से हिस्से को पूरा करने की प्रगति बहुत धीमी है. जीडीए ने पहले ही इस भूमि का अधिग्रहण कर लिया था. उसने बाई-पास सड़क का 80% निर्माण भी कर लिया है. एडीएम (एलए) भूमि अधिग्रहण पुनर्वास और पुनर्वास अधिनियम 2013 के तहत, धारा 11 (1) के तहत खंड 3 के अनुसार भूमि अधिग्रहण पर काम कर रहा है, लेकिन बहुत धीमी गति से. इसी के चलते यहा लोगों को ट्रैफिक और वायु प्रदूषण से समस्या हो रही है.

Ghaziabad News: क्या है गाजियाबाद की समस्या क्यों लोगों का जीना हो गया बेहाल

New Delhi News: गाजियाबाद की जनता प्रदूषण और ट्रैफिक से वैसे ही बेहाल थी, कि एक ओर रिपोर्ट ने उनका तनाव बढ़ा दिया है. दरअसल, बुरी खबर यह है कि गाजियाबाद उत्तर भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने साल 2021 के लिए PM2.5 के आधार पर प्रदूषण का अध्ययन किया. इस अध्ययन में पता चला कि गाजियाबाद में प्रदूषण से जनता बेहाल है. यहां के रहवासी बाई-पास सड़क के अधूरे निर्माण और ट्रैफिक की वजह से प्रदूषित माहौल में रहने को मजबूर हैं.

सर्वे में पूरे यूपी में सबसे दूषित शहर निकला मुजफ्फरनगर

दिल्ली-NCR और वेस्ट यूपी की हवा गर्मियों में ही जहरीली हो गई है। हवा में पीएम 2.5 (पर्टिकुलेट मैटर) का लेवल देश के दक्षिण भारत के शहरों से 3 गुना अधिक बढ़ गया है। दिल्ली की संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट यानी CSE ने 2022 की गर्मी में शहरों में प्रदूषण के स्तर पर सर्वे किया। सर्वे में NCR और उत्तर प्रदेश की हवा सबसे जहरीली पाई गई है। CSE के राष्ट्रीय मूल्यांकन के अनुसार इस गर्मी में दिल्ली, NCR और पश्चिमी यूपी प्रदूषण का हॉटस्पॉट है। जहां पीएम 2.5 का लेवल देश के दूसरे शहरों से लगभग 3 गुना ज्यादा है। इसका बड़ा कारण हैवी ट्रैफिक, इंडस्ट्री और रेग्युलर कंस्ट्रक्शन वर्क के साथ इस बार 61% कम बारिश है। CSE के साइंटिस्ट सुपर्णो कहती हैं, "सर्दियों में सूरज की रोशनी कम होने के कारण हवा में हमें धुंध की चादर साफ दिखाई देती है। ये चादर पीएम 2.5 के कणों से बनी प्रदूषण की लेयर होती है। जो स्मॉग के रूप में हमें पूरी दिल्ली, NCR और वेस्टर्न यूपी के शहरों में दिखती है। गर्मियों में तेज धूप के कारण पीएम 2.5 के हानिकारक कण हवा में नजर नहीं आते। हमें लगता है आसमान साफ है। जो आंखों का धोखा है।" सर्वे में उत्तर भारत सबसे प्रदूषित पाया गया। दिल्ली-NCR इस बार गर्मियों में प्रदूषण का हॉटस्पॉट बना है। गर्मियों में वेस्ट यूपी की हवा में PM 2.5 का स्तर 71 माइक्रोग्राम प्रति वर्ग मीटर निकला। जो पूर्वी भारत में 69 माइक्रोग्राम प्रति वर्ग मीटर था। पश्चिम भारत (54 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) और मध्य भारत (46 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) ने भी 40 माइक्रोग्राम प्रति वर्ग मीटर आया। अन्य क्षेत्रों की तुलना में पूर्वोत्तर भारत (35 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) और दक्षिण भारत (31 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) स्वच्छ थे। उत्तर भारत में दिल्ली-NCR सबसे प्रदूषित उप-क्षेत्र पाया गया। दिल्ली-NCR के शहरों में गर्मियों में पीएम 2.5 का औसत बहुत अधिक दर्ज किया गया। शोधकर्ता अविकल के अनुसार रिसर्च में छोटे शहरों में पॉल्यूशलन लेवल हाई मिला। मुजफ्फरनगर पूरे यूपी में सबसे दूषित शहर निकला। यूपी में प्रदूषण के मामले में दूसरे नंबर पर गाजियाबाद है। तीसरे नंबर पर हापुड़, मेरठ, बुलंदशहर, बागपत हैं। जिनकी हवा में प्रदूषण का स्तर हाई है। देश में हरियाणा के भिवाड़ी में प्रदूषण काफी है।

UP में प्रदूषण के मामले में मुजफ्फरनगर नंबर वन:गर्मियों में वेस्ट यूपी में सबसे ज्यादा प्रदूषण

गर्मियों में ही यूपी के कई शहरों में प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ गया है। देश की राजधानी दिल्ली से NCR और वेस्ट यूपी की हवा जहरीली हो गई है। हवा में पीएम 2.5 (पर्टिकुलेट मैटर) का लेवल देश के दक्षिण भारत के शहरों से 3 गुना अधिक बढ़ गया है।मुजफ्फरनगर में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण दर्ज किया गया है। इस प्रदूषण के लिए यूपी में 61 फीसदी कम बारिश को बड़ी वजह बताया जा रहा है। दिल्ली की संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट यानी CSE ने 2022 की गर्मी में शहरों में प्रदूषण के स्तर पर सर्वे किया।मुजफ्फरनगर में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण दर्ज किया गया है। इस प्रदूषण के लिए यूपी में 61 फीसदी कम बारिश को बड़ी वजह बताया जा रहा है। दिल्ली की संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट यानी CSE ने 2022 की गर्मी में शहरों में प्रदूषण के स्तर पर सर्वे किया। सर्वे में NCR और उत्तर प्रदेश की हवा सबसे जहरीली पाई गई है। CSE के राष्ट्रीय मूल्यांकन के अनुसार इस गर्मी में दिल्ली, NCR और पश्चिमी यूपी प्रदूषण का हॉटस्पॉट है। जहां पीएम 2.5 का लेवल देश के दूसरे शहरों से लगभग 3 गुना ज्यादा है। इसका बड़ा कारण हैवी ट्रैफिक, इंडस्ट्री और रेग्युलर कंस्ट्रक्शन वर्क के साथ इस बार 61% कम बारिश है।CSE के साइंटिस्ट सुपर्णो कहती हैं, "सर्दियों में सूरज की रोशनी कम होने के कारण हवा में हमें धुंध की चादर साफ दिखाई देती है। ये चादर पीएम 2.5 के कणों से बनी प्रदूषण की लेयर होती है। जो स्मॉग के रूप में हमें पूरी दिल्ली, NCR और वेस्टर्न यूपी के शहरों में दिखती है। गर्मियों में तेज धूप के कारण पीएम 2.5 के हानिकारक कण हवा में नजर नहीं आते। हमें लगता है आसमान साफ है। जो आंखों का धोखा है।"CSE ने अपने इस सर्वे में देश के 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 174 शहरों में फैले कंटीन्यूअस एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम यानी CAAQMS के तहत 356 आधिकारिक स्टेशनों से डेटा कैप्चर किया। इस डेटा के आधार पर शहर की गर्मी का लेवल और पॉल्यूशन लेवल का मिलान किया गया। इसके आधार पर तैयार सर्वे रिपोर्ट को सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की साइट पर अपलोड किया गया है। CSE ने अपने इस सर्वे में देश के 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 174 शहरों में फैले कंटीन्यूअस एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम यानी CAAQMS के तहत 356 आधिकारिक स्टेशनों से डेटा कैप्चर किया। इस डेटा के आधार पर शहर की गर्मी का लेवल और पॉल्यूशन लेवल का मिलान किया गया। इसके आधार पर तैयार सर्वे रिपोर्ट को सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की साइट पर अपलोड किया गया है।उत्तर भारत में दिल्ली-NCR सबसे प्रदूषित उप-क्षेत्र पाया गया। दिल्ली-NCR के शहरों में गर्मियों में पीएम 2.5 का औसत बहुत अधिक दर्ज किया गया। शोधकर्ता अविकल के अनुसार रिसर्च में छोटे शहरों में पॉल्यूशलन लेवल हाई मिला। मुजफ्फरनगर पूरे यूपी में सबसे दूषित शहर निकला। यूपी में प्रदूषण के मामले में दूसरे नंबर पर गाजियाबाद है। तीसरे नंबर पर हापुड़, मेरठ, बुलंदशहर, बागपत हैं। जिनकी हवा में प्रदूषण का स्तर हाई है। देश में हरियाणा के भिवाड़ी में प्रदूषण काफी है।

Bathinda, Bahadurgarh air among ‘foulest’ in India

Bathinda: Punjab’s Bathinda and Haryana’s Bahadurgarh are among the Indian cities with foulest air. Cities within and outside National Clean Air Programme (NCAP) showed barely different particulate matter 2.5 (PM2.5) trends in private advocacy Centre for Science and Environment’s analysis report released on the eve of the UN Day of Clean Air for Blue Sky. Punjab, Rajasthan and Maharashtra dominated the NCAP list of cities with significant increase in the PM2.5 levels. In the 46 non-covered cities, 15 have worsened significantly. Ankleshwar in Gujarat is the worst with 34% increase, while Bahadurgarh (Haryana), and Bathinda (Punjab) are second with 20% increase. Haryana, MP and Gujarat dominate the non-NCAP list. Palwal (Haryana) with 60% improvement is the best. The NCAP targets 20 to 30% reduction in PM2.5 and PM10 concentrations by 2024 from base year 2017 but Central Pollution Control Board’s latest assessment for disbursement of performance-linked funds has considered only thge PM10 data of coarse dust particles. PM2.5 are tinier particles but much more harmful. CSE’s research and advocacy executive director Anumita Roychowdhury said: “Dependence on only manual monitoring of PM10 creates a bias in spending, as it shifts focus towards dust control and diverts attention from composite action on industry, vehicles, waste, and solid fuel burning.” The NCAP covers 132 cities, 82 of which are funded by the programme. While 50 cities received money from the 15th Finance Commission, Rs 6,425 crore has been released till the year 2021-22, while Rs 2,299 crore is earmarked for the year 2022-23. Cities are required to quantify improvement, which must be 15% or greater reduction in the annual average PM10 concentration and a concurrent increase in good air days to more than 200. Anything below will reduce the funding. Both kind of cities (NCAP and non-NCAP) have mixed air quality even when the climatic zones change, which means that they must reduced their suspended particulate matter substantially for meeting the national ambient air quality standards. The centre measured near-identical annual PM2.5 level increase in 16 NCAP and 15 non-NCAP cities, besides near-identical improvement in 20 NCAP and 21 non-NCAP cities. In all the cities under survey, the air improved significantly in 2020’s extended lockdown when the Covid-19 pandemic started.

जान की परवाह नहीं

अब ये कहा जा सकता है कि जब कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान मौत के तांडव से जो समाज स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर नहीं जागा, उसे प्रदूषण के धीमे जहर की क्या फिक्र होगी! भारत में आम मानस को देखें, तो यही समझ में आता है कि यहां लोगों को दूसरों के जान की तो छोड़िए, खुद अपनी जान की कीमत भी महसूस नहीं होती। वरना, इस देश में उस तरह पर्यावरण मानदंडों की उपेक्षा नहीं होती, जैसा होता अक्सर दिखता है। आम तौर पर लोगों को इस बात का अहसास ही नहीं है कि खराब हवा किस तरह उनके जीवन काल को कम करती जा रही है। जबकि इस बारे में जानकारियों का अभाव नहीं है। ताजा जानकारियां अगर कोई लेना चाहे, तो दिल्ली स्थित संस्था सेंटर फॉर साइंट एंड एनवायरॉनमेंट (सीएसई) की ताजा रिपोर्ट पर गौर कर सकता है। सीएसई ने उत्तर भारत के शहरों में प्रदूषण पर ये रिपोर्ट जारी की है। उसने अपने शोध के लिए उत्तर भारत के 56 शहरों में पीएम 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर) के 2021 के डेटा का विश्लेषण किया। उसके इस शोध के नतीजे चौंकाने वाले हैं। इसके मुताबिक राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत आने वाले और इसके दायरे से बाहर रहने वाले शहरों के बीच पीएम 2.5 की प्रवृत्तियों में नाममात्र का अंतर है। एनसीएपी ने 2024 तक देश में पीएम 2.5 और पीएम 10 की मात्रा में 20 से 30 फीसदी तक की कटौती का लक्ष्य तय किया है। सीएसई ने है कहा कि एनसीएपी वाले केवल 43 शहरों में 2019-2021 के लिए पीएम 2.5 के पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध हैं, जो प्रगति पर नजर रखने के लिहाज से काफी हैं। सीएसई का कहना है कि देश में कोविड लॉकडाउन के बाद मुंबई में प्रदूषण के स्तर में सबसे तेज वृद्धि हुई है। वहीं चेन्नई में कोविड के बाद प्रदूषण के स्तर में कमी हुई है। दिल्ली में कोविड लॉकडाउन के बाद 13 फीसदी तक प्रदूषण बढ़ा है। लॉक़डाउन के दौरान प्रदषण घटने से वातावरण बेहतर हुआ था। लेकिन आम जिंदगी बहाल होते ही वे तत्व वातावरण में पहले जैसी तेजी से घुल रहे हैं, जिन्हें वैज्ञानिक स्लो प्वॉइजन कहते हैँ। अब ये कहा जा सकता है कि जब कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान मौत के तांडव से जो समाज स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर नहीं जागा, उसे धीमे जहर की क्या फिक्र होगी!

don’t care about life

Now it can be said that when the society did not wake up to the health system due to the orgy of death during the second wave of the corona epidemic, What would he care about the slow poison of pollution! If we look at the common psyche in India, then it is understandable that people here do not even feel the value of their own life, leaving aside the lives of others. Otherwise, environmental norms are not neglected in this country as it often seems. Generally people do not realize how bad air is reducing their life span. While there is no dearth of information about this. If anyone wants to get the latest information, then one can look at the latest report of the Center for Science and Environment (CSE), a Delhi-based organization. CSE has released this report on pollution in cities of North India. For his research, he analyzed data for 2021 of PM 2.5 (particulate matter) in 56 cities in North India. The results of his research are shocking. According to this, there is a marginal difference in PM 2.5 trends between cities that are covered under the National Clean Air Program (NCAP) and those outside its purview. The NCAP has set a target of reducing the amount of PM 2.5 and PM 10 in the country by 20 to 30 percent by 2024.