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कोरोना की दूसरी लहर का ग्रामीण भारत में रहा प्रकोप, ग्रामीण क्षेत्रों आये 53 फीसदी नये मामले

कोरोना वारस की दूसरी लहर की चपेट में शहरी क्षेत्रों के ग्रामीण क्षेत्र आये. सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरनमेंट की ओरे जारी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ कि कोरोना मई के छह दिनों में जो सबसे अधिक दैनिक मामले आये उनमें भारत के ग्रामीण जिलों का सबसे अधिक योगदान था. विश्व पर्यावरण दिवस को लेकर जारी किये गये रिपोर्ट में CSE के आंकड़ों के मुताबिक पिछले महीने देश में 53 फीसदी नये मामले और 52 फीसदी मौतें ग्रामीण जिलों से दर्ज की गयी. सीएसई ने नई सांख्यिकीय रिपोर्ट स्टेज ऑफ इंडियाज इनवायरमेंट इन फिंगर्स 2021 में कहा कि कोरोना महामारी ने देश की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है. इसने ग्रामीण भारत में महामारी के चिंताजनक हालात को दिखाया तो शहरी क्षेत्रों में भारत की तैयारियों की दयनीय स्थिति को दिखाया. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदा बुनियादी स्वास्थ्य ढांचा का मजबूत करने की जरूरत है. ग्रामीण भारत के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 76 फीसदी से अधिक डॉक्टर्स , 56 फीसदी से अधिक रेडियोग्राफर्स और 35 फीसदी से अधिक लैब तकनीशियनों की आवश्यकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मई महीने की 26 दिनों में जो विश्व स्तर पर मामले दर्ज किये गये. उनमें हर दूसरा मामला भारत का था और हर तीसरी मौत भारत में हुई थी. जो ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना के दूसरी लहर के कारण हो रही थी. इसे अगर देखे तो दुनिया में दर्ज किया गया हर चौथा मामला ग्रामीण भारत से था. सीएसीई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि यह समय नीतिगत निर्णय लेने का है और संकट को खत्म करने के लिए आंकडों के अनुरुप काम करने का है. उन्होंने कहा कि आज यह माना जा रहा है कि चूक हुई है. क्योंकि दूसरी लहर की भविष्यवाणी के बीच देश की आबादी का प्रतिरक्षा सर्वेक्षण का पर्याप्त डाटा मौजूद नहीं था. सीएसई ने बॉयोमेडिकल कचरे का भी हवाला दिया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोमा महामारी के कारण देश में अप्रैल और मई 2021 के बीच कोरोना वायरस के चलते बॉयोमिडकल कचरे में 46 फीसदी वृद्धि हुई है. क्योंकि इस समय इस कचरे का निपटारण बंद हो गया था. जबकि यह ऐसा समय था जब देश के अस्पतालों में कोरोना से जूझ रहे मरीज हर रोज मई के महीने में दो लाख किलो कचरा उत्पन्न कर रहे थे. जो भारत के के नॉन कोविड बॉयोमेडिकल वेस्ट का 33 फीसदी है.

World Environment Day: India produced 45,308 tonnes of Covid-19 biomedical waste in previous one year

According to the Central Pollution Control Board (CPCB), India has been generating nearly 146 tonnes of bio-medical waste everyday due to diagnostic activities and treatment of Covid-19 patients. Biomedical waste is a threat to global public environmental health and with ‘plastic footprint’ becoming larger by the day due to the ongoing Covid-19 pandemic, concerns on plastic waste choking the planet are mounting. According to the Central Pollution Control Board (CPCB), India has been generating nearly 146 tonnes of bio-medical waste every day due to diagnostic activities and treatment of Covid-19 patients. Between June 2020 and May 10, 2021, India produced 45,308 tonnes of Covid-19 biomedical waste. This is in addition to the 615 tonnes of biomedical waste a day being produced before Covid-19, the pollution control board's data showed. This is an increase of almost 17% in biomedical waste generation solely because of the pandemic. "There has been a general increase and since it is a crisis situation, we are not thinking of plastic but general prevention. The focus is no longer plastic, so that is a problem," news agency PTI quoted Ravi Agarwal, founder-director of the environmental non-profit Toxics Link, saying. Agarwal also noted that a lot of biomedical waste like face masks, PPE kits are being generated from normal households and it is also contributing to the problem significantly. "These things are finding their way across ecosystems. A lot of these things like masks can be seen on beaches, in coral reefs etc," he also said. Apart from Covid-related medical waste, what is also contributing to plastic waste is people using home delivery services for essential and non-essential shopping more than before. Lack of Covid-waste disposal mechanisms is also a major contributor to the problem. Under the existing rules by CPCB, biomedical waste is segregated into four categories. While the yellow category is for waste that is classified as “highly infectious” — such as human, animal, anatomical, and soiled — red is for contaminated recyclable waste generated from disposable items like tubing, bottles tubes, syringes. Sharp objects like needles, syringes with fixed needles are segregated into the white category and broken or discarded and contaminated glassware, including medicine vials are categorised into the blue category. However, as the Covid waste is considered potentially infectious, it is tagged yellow and incinerated. "We never know the extent of pollution we are doing... We are converting our land-based pollution to water or air pollution. That’s what we end up doing,” said Siddharth Singh, deputy programme manager at the Centre for Science and Environment (CSE), as per PTI.

दिल्ली-एनसीआर की हवा स्वच्छ करने के मामले में लॉकडाउन पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं: सीएसई

IBC24 | June 5, 2021 नयी दिल्ली, चार जून (भाषा) दिल्ली-एनसीआर में इस साल लॉकडाउन की वजह से वायु गुणवत्ता में सुधार तो देखने को मिला लेकिन यह पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा क्योंकि 2021 में लगा लॉकडाउन पिछले साल की तुलना में छोटा और कम कड़ाई वाला था। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंन्ट (सीएसई) के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। अध्ययन में बताया गया कि मौसम संबंधी स्थिति इस अंतर के लिए आंशिक तौर पर जिम्मेदार हो सकती है लेकिन यह आंकड़ा इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कदम इस शहर और क्षेत्र में कड़ाई से नहीं उठाए गए हैं। इस अध्ययन के अनुसार 2021 में यातायात आवाजाही भी पहले की तुलना में ज्यादा है। इस साल छह अप्रैल से दिल्ली में प्रतिबंध रात्रिकालीन कर्फ्यू और सप्ताहांत में लॉकडाउन से शुरू हुई और 19 अप्रैल से पूर्ण लॉकडाउन लागू किया गया। अध्ययन के मुताबिक आंशिक लॉकडाउन से पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व के स्तर में 20 फीसदी तक की कमी आई जबकि पूर्ण लॉकडाउन से इसके स्तर में 12 फ़ीसदी की और गिरावट आई। सीएसई ने बताया, ‘‘ 2020 में आंशिक लॉकडाउन 12 मार्च से शुरू हो गया था और 25 मार्च से कड़े लॉकडाउन लागू थे, जिसे 18 मई से चरणबद्ध तरीके से हटाया गया। पिछले साल आंशिक लॉकडाउन के दौरान पीएम2.5 में 20 फीसदी की कमी आई जबकि कड़ाई से लागू लॉकडाउन से पीएम-2.5 का स्तर 35 फीसदी और कम हुआ।’’

प्रदूषण कम करने में इस साल प्रभावी नहीं रहा लॉकडाउन, दिल्ली-NCR की हवा नहीं हुई साफ

Delhi Pollution Check: इस साल 6 अप्रैल से दिल्ली में नाइट कर्फ्यू और वीकेंड लॉकडाउन के बाद 19 अप्रैल से पूर्ण तालाबंदी की गई, फिर भी हवा की गुणवत्ता में सुधार नहीं दिखा. ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल की तुलना में इस बार ट्रैफिक की आवाजाही ज्यादा रही. नई दिल्ली. दिल्ली-एनसीआर में इस साल लॉकडाउन की वजह से वायु गुणवत्ता (AQI) में सुधार तो देखने को मिला लेकिन यह पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा, क्योंकि 2021 में लगा लॉकडाउन (Lockdown) पिछले साल की तुलना में छोटा और कम कड़ाई वाला था. सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंन्ट (सीएसई) के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है. अध्ययन में बताया गया कि मौसम संबंधी स्थिति इस अंतर के लिए आंशिक तौर पर जिम्मेदार हो सकती है लेकिन यह आंकड़ा इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कदम इस शहर और क्षेत्र में कड़ाई से नहीं उठाए गए हैं. इस अध्ययन के अनुसार 2021 में यातायात आवाजाही भी पहले की तुलना में ज्यादा है. इस साल छह अप्रैल से दिल्ली में प्रतिबंध रात्रिकालीन कर्फ्यू और सप्ताहांत में लॉकडाउन से शुरू हुई और 19 अप्रैल से पूर्ण लॉकडाउन लागू किया गया. अध्ययन के मुताबिक, आंशिक लॉकडाउन से पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व के स्तर में 20 फीसदी तक की कमी आई जबकि पूर्ण लॉकडाउन से इसके स्तर में 12 फ़ीसदी की और गिरावट आई. लॉकडाउन से पीएम-2.5 का स्तर 35 फीसदी और कम हुआ सीएसई ने बताया, ‘‘ 2020 में आंशिक लॉकडाउन 12 मार्च से शुरू हो गया था और 25 मार्च से कड़े लॉकडाउन लागू थे, जिसे 18 मई से चरणबद्ध तरीके से हटाया गया. पिछले साल आंशिक लॉकडाउन के दौरान पीएम2.5 में 20 फीसदी की कमी आई जबकि कड़ाई से लागू लॉकडाउन से पीएम-2.5 का स्तर 35 फीसदी और कम हुआ.’’

दिल्ली-एनसीआर की हवा साफ करने के मामले में पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा लॉकडाउन, सीएसई ने पेश किए आंकड़े

ABP Live | June 5, 2021 कोरोना वायरस संक्रमण के कारण बीते साल लगाए गए लॉकडाउन की अपेक्षा इस साल लगाया गया लॉकडाउन वायु गुणवत्ता सुधार के लिए ज्यादा प्रभावी नहीं रहा. सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंन्ट (सीएसई) ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है कि बीते साल की तरह इस साल लॉकडाउन में प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कदम कड़ाई से नहीं उठाए गए हैं. नई दिल्लीः दिल्ली-एनसीआर में इस साल लॉकडाउन की वजह से वायु गुणवत्ता में सुधार तो देखने को मिला लेकिन यह पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा क्योंकि 2021 में लगा लॉकडाउन पिछले साल की तुलना में छोटा और कम कड़ाई वाला था. सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंन्ट (सीएसई) के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है. अध्ययन में बताया गया कि मौसम संबंधी स्थिति इस अंतर के लिए आंशिक तौर पर जिम्मेदार हो सकती है लेकिन यह आंकड़ा इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कदम इस शहर और क्षेत्र में कड़ाई से नहीं उठाए गए हैं. इस अध्ययन के अनुसार 2021 में यातायात आवाजाही भी पहले की तुलना में ज्यादा है. इस साल छह अप्रैल से दिल्ली में प्रतिबंध रात्रिकालीन कर्फ्यू और सप्ताहांत में लॉकडाउन से शुरू हुई और 19 अप्रैल से पूर्ण लॉकडाउन लागू किया गया. अध्ययन के मुताबिक आंशिक लॉकडाउन से पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व के स्तर में 20 फीसदी तक की कमी आई जबकि पूर्ण लॉकडाउन से इसके स्तर में 12 फ़ीसदी की और गिरावट आई. सीएसई ने बताया, 2020 में आंशिक लॉकडाउन 12 मार्च से शुरू हो गया था और 25 मार्च से कड़े लॉकडाउन लागू थे, जिसे 18 मई से चरणबद्ध तरीके से हटाया गया. पिछले साल आंशिक लॉकडाउन के दौरान पीएम2.5 में 20 फीसदी की कमी आई जबकि कड़ाई से लागू लॉकडाउन से पीएम-2.5 का स्तर 35 फीसदी और कम हुआ. वहीं कोरोना संक्रमण की बात करें तो भारत में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 2 करोड़ 86 लाख 93 हजार के पार पहुंच गया है. देशभऱ में अभी तक कोरोना संक्रमण के कारण 3 लाख 44 हजार से ज्यादा की मौत भी हो गई है. वर्तमान देशभर में कोरोना एक्टिव मरीजों की संख्या पहले से घटकर 15 लाख 62 हजार तक पहुंच गई है. फिलहाल अभी तक 2 करोड़ 67 लाख 87 हजार लोगों का कोरोना से सफल इलाज हुआ है.

दिल्ली NCR की हवा नहीं हुई साफ, 2021 के लॉकडाउन में नहीं दिखा पिछले साल जैसा असर- CSE बोली

सीएसई के अध्ययन में यह भी कहा गया है कि आंशिक लॉकडाउन से पीएम 2.5 प्रदूषण के स्तर में 20 फीसदी तक की कमी आई जबकि पूर्ण लॉकडाउन से इसके स्तर में 12 फ़ीसदी की और गिरावट देखी गई है. नई दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर में इस साल लॉकडाउन की वजह से पॉल्युशन के स्तर पर कोई प्रभाव होता दिखाई नहीं दिया है. सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंन्ट (सीएसई) ने एक अध्ययन किया है और बताया है कि वायु गुणवत्ता में सुधार तो देखने को मिला लेकिन यह पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा क्योंकि 2021 में लगा लॉकडाउन पिछले साल की तुलना में छोटा और कम कड़ाई वाला था. अध्ययन में बताया गया कि मौसम संबंधी स्थिति इस अंतर के लिए आंशिक तौर पर जिम्मेदार हो सकती है लेकिन यह आंकड़ा इस बात को दिखाता है कि प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कदम इस शहर और क्षेत्र में कड़ाई से नहीं उठाए गए हैं. इस अध्ययन के अनुसार 2021 में यातायात आवाजाही भी पहले की तुलना में ज्यादा है. इस साल छह अप्रैल से दिल्ली में प्रतिबंध रात्रिकालीन कर्फ्यू और सप्ताहांत में लॉकडाउन से शुरू हुई और 19 अप्रैल से पूर्ण लॉकडाउन लागू किया गया. अध्ययन के मुताबिक आंशिक लॉकडाउन से पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व के स्तर में 20 फीसदी तक की कमी आई जबकि पूर्ण लॉकडाउन से इसके स्तर में 12 फ़ीसदी की और गिरावट आई. सीएसई ने बताया, ‘ 2020 में आंशिक लॉकडाउन 12 मार्च से शुरू हो गया था और 25 मार्च से कड़े लॉकडाउन लागू थे, जिसे 18 मई से चरणबद्ध तरीके से हटाया गया. पिछले साल आंशिक लॉकडाउन के दौरान पीएम 2.5 में 20 फीसदी की कमी आई जबकि कड़ाई से लागू लॉकडाउन से पीएम-2.5 का स्तर 35 फीसदी और कम हुआ.’

दिल्ली-एनसीआर में इस साल लॉकडाउन की वजह से वायु गुणवत्ता में सुधार..

नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में इस साल लॉकडाउन की वजह से वायु गुणवत्ता में सुधार तो देखने को मिला लेकिन यह पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा क्योंकि 2021 में लगा लॉकडाउन पिछले साल की तुलना में छोटा और कम कड़ाई वाला था। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंन्ट (सीएसई) के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। अध्ययन में बताया गया कि मौसम संबंधी स्थिति इस अंतर के लिए आंशिक तौर पर जिम्मेदार हो सकती है लेकिन यह आंकड़ा इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कदम इस शहर और क्षेत्र में कड़ाई से नहीं उठाए गए हैं। इस अध्ययन के अनुसार 2021 में यातायात आवाजाही भी पहले की तुलना में ज्यादा है। इस साल छह अप्रैल से दिल्ली में प्रतिबंध रात्रिकालीन कर्फ्यू और सप्ताहांत में लॉकडाउन से शुरू हुई और 19 अप्रैल से पूर्ण लॉकडाउन लागू किया गया। अध्ययन के मुताबिक आंशिक लॉकडाउन से पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व के स्तर में 20 फीसदी तक की कमी आई जबकि पूर्ण लॉकडाउन से इसके स्तर में 12 फ़ीसदी की और गिरावट आई। सीएसई ने बताया, ‘‘ 2020 में आंशिक लॉकडाउन 12 मार्च से शुरू हो गया था और 25 मार्च से कड़े लॉकडाउन लागू थे, जिसे 18 मई से चरणबद्ध तरीके से हटाया गया। पिछले साल आंशिक लॉकडाउन के दौरान पीएम2.5 में 20 फीसदी की कमी आई जबकि कड़ाई से लागू लॉकडाउन से पीएम-2.5 का स्तर 35 फीसदी और कम हुआ।

दिल्ली-एनसीआर की हवा साफ करने के मामले में पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा लॉकडाउन, सीएसई ने पेश किए आंकड़े

दिल्ली-एनसीआर की हवा साफ करने के मामले में पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा लॉकडाउन, सीएसई ने पेश किए आंकड़े नई दिल्लीःदिल्ली-एनसीआर में इस साल लॉकडाउन की वजह से वायु गुणवत्ता में सुधार तो देखने को मिला लेकिन यह पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा क्योंकि 2021 में लगा लॉकडाउन पिछले साल की तुलना में छोटा और कम कड़ाई वाला था. सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंन्ट (सीएसई) के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है अध्ययन में बताया गया कि मौसम संबंधी स्थिति इस अंतर के लिए आंशिक तौर पर जिम्मेदार हो सकती है लेकिन यह आंकड़ा इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कदम इस शहर और क्षेत्र में कड़ाई से नहीं उठाए गए हैं. इस अध्ययन के अनुसार 2021 में यातायात आवाजाही भी पहले की तुलना में ज्यादा है. इस साल छह अप्रैल से दिल्ली में प्रतिबंध रात्रिकालीन कर्फ्यू और सप्ताहांत में लॉकडाउन से शुरू हुई और 19 अप्रैल से पूर्ण लॉकडाउन लागू किया गया अध्ययन के मुताबिक आंशिक लॉकडाउन से पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व के स्तर में 20 फीसदी तक की कमी आई जबकि पूर्ण लॉकडाउन से इसके स्तर में 12 फ़ीसदी की और गिरावट आई. सीएसई ने बताया, 2020 में आंशिक लॉकडाउन 12 मार्च से शुरू हो गया था और 25 मार्च से कड़े लॉकडाउन लागू थे, जिसे 18 मई से चरणबद्ध तरीके से हटाया गया. पिछले साल आंशिक लॉकडाउन के दौरान पीएम2.5 में 20 फीसदी की कमी आई जबकि कड़ाई से लागू लॉकडाउन से पीएम-2.5 का स्तर 35 फीसदी और कम हुआ वहीं कोरोना संक्रमण की बात करें तो भारत में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 2 करोड़ 86 लाख 93 हजार के पार पहुंच गया है. देशभऱ में अभी तक कोरोना संक्रमण के कारण 3 लाख 44 हजार से ज्यादा की मौत भी हो गई है. वर्तमान देशभर में कोरोना एक्टिव मरीजों की संख्या पहले से घटकर 15 लाख 62 हजार तक पहुंच गई है. फिलहाल अभी तक 2 करोड़ 67 लाख 87 हजार लोगों का कोरोना से सफल इलाज हुआ है

प्रदूषण में कमी लाने में इस साल कामयाब न रहा लॉकडाउन, सीएसई की रिपोर्ट में खुलासा

नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। लॉकडाउन ने इस साल भी दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता में सुधार तो किया है, लेकिन पिछले साल की तरह प्रभावी ढंग से नहीं। वजह, 2021 के प्रतिबंध छोटे और कम कड़े होना। यह सामने आया है सेंटर फार साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के एक आंकलन में। इस साल जो सुधार हुआ, उसके लिए भी मौसम का योगदान ज्यादा रहा। 2021 में यातायात की तीव्रता भी तुलनात्मक रूप से अधिक थी। इस साल दिल्ली में प्रतिबंध छह अप्रैल को रात का कर्फ्यू (Night Curfew) और सप्ताहांत के लॉकडाउन के रूप में शुरू हुए, जिसमें 19 अप्रैल को पूर्ण लॉकडाउन लगाया गया था। आंशिक-लॉकडाउन लागू करने से पीएम 2.5 प्रदूषण स्तर 20 फीसद तक कम हो गया। सीएसई विश्लेषण के अनुसार जबकि पूर्ण लॉकडाउन ने औसत को 12 फीसद और नीचे ला दिया।2020 में आंशिक लाकडाउन 12 मार्च को, 25 मार्च को पूर्ण लॉकडाउन के साथ शुरू हुआ, जिसे 18 मई से चरणबद्ध तरीके से हटा लिया गया। आंशिक लॉकडाउन ने पीएम 2.5 के स्तर को 20 फीसद तक नीचे ला दिया, लेकिन पूर्ण लाकडाउन ने इसे और 35 फीसद कम कर दिया। 18 मई से प्रतिबंध हटाने से पीएम 2.5 के स्तर में 28 पुीसद की वृद्धि हुई। सीएसई ने यह भी कहा कि 2020 और 2021 में लॉकडाउन ग्रीष्मकाल 2019 की गर्मियों की तुलना में 25 से 40 फीसद स्वच्छ रहा है। 2021 के वसंत (जनवरी-मार्च) ने 2019 के बाद से सीजन के लिए उच्चतम प्रदूषण स्तर दर्ज किया है। आमतौर पर पीएम 2.5 के स्तर में एक बड़ी वजह मौसमी चक्र होता है। सर्दी सबसे अधिक प्रदूषित होती है और मानसून का मौसम सबसे साफ होता है। वसंत (जनवरी से मार्च) दो चरम सीमाओं के बीच एक संक्रमणकालीन अवधि के रूप में कार्य करता है। पीएम 2.5 के स्तर में एक महत्वपूर्ण गिरावट तब होती है जब मौसम गर्म होता है और वसंत के दौरान हवा तेज हो जाती है। 2018 की सर्दियों और 2019 के वसंत के बीच 26 फीसद की गिरावट आई थी। 2020 में प्रदूषण नियंत्रण उपायों के कारण और मार्च 2020 में आंशिक लॉकडाउन लागू होने के कारण यह गिरावट बढ़कर 36 फीसद हो गई। इस साल प्रदूषण जारी नहीं रहा, मौसमी गिरावट 18 फीसद तक सीमित रही। वास्तव में इस साल वसंत 2020 की तुलना में 31 फीसद और 2019 की तुलना में आठ फीसद अधिक गंदा प्रदूषण रहा। सीएसई विश्लेषण ने यह भी दिखाया कि इस फरवरी-मार्च में वायु गुणवत्ता के मामले में 27 दिन बहुत खराब श्रेणी वाले थे जबकि 2020 में 17 और 2019 में 12 दिन थे। वायु गुणवत्ता मानक को पूरा करने वाले दिनों ने भी इस वसंत ऋतु को केवल दो तक गिरा दिया। वर्ष 2020 में 16 और 2019 में छह दिन थे जब मानक पूरा हुआ।

पर्यावरण के लिए पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा लॉकडाउन, NCR में कोई खास स्वच्छ साफ नहीं हुई हवा

नयी दिल्ली/लखनऊः दिल्ली-एनसीआर में इस साल लॉकडाउन की वजह से वायु गुणवत्ता में सुधार तो देखने को मिला लेकिन यह पिछले साल जैसा प्रभावी नहीं रहा क्योंकि 2021 में लगा लॉकडाउन पिछले साल की तुलना में छोटा और कम कड़ाई वाला था। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंन्ट (सीएसई) के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। अध्ययन में बताया गया कि मौसम संबंधी स्थिति इस अंतर के लिए आंशिक तौर पर जिम्मेदार हो सकती है लेकिन यह आंकड़ा इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कदम इस शहर और क्षेत्र में कड़ाई से नहीं उठाए गए हैं। इस अध्ययन के अनुसार 2021 में यातायात आवाजाही भी पहले की तुलना में ज्यादा है। इस साल छह अप्रैल से दिल्ली में प्रतिबंध रात्रिकालीन कर्फ्यू और सप्ताहांत में लॉकडाउन से शुरू हुई और 19 अप्रैल से पूर्ण लॉकडाउन लागू किया गया। अध्ययन के मुताबिक आंशिक लॉकडाउन से पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व के स्तर में 20 फीसदी तक की कमी आई जबकि पूर्ण लॉकडाउन से इसके स्तर में 12 फ़ीसदी की और गिरावट आई। सीएसई ने बताया, ‘‘ 2020 में आंशिक लॉकडाउन 12 मार्च से शुरू हो गया था और 25 मार्च से कड़े लॉकडाउन लागू थे, जिसे 18 मई से चरणबद्ध तरीके से हटाया गया। पिछले साल आंशिक लॉकडाउन के दौरान पीएम2.5 में 20 फीसदी की कमी आई जबकि कड़ाई से लागू लॉकडाउन से पीएम-2.5 का स्तर 35 फीसदी और कम हुआ।''

All IMD Air High quality Monitoring Stations In Delhi Offline: Suppose Tank

Not one of the eight air high quality monitoring stations (AQMs) of the India Meteorological Division (IMD) in Delhi has relayed information to the central server within the final two months, the Centre for Science and Setting stated on Friday. The IMD stated the AQMs are useful however information just isn’t being relayed to the central server on account of a technical challenge. “Though Delhi’s monitoring community grew to 40 stations by the top of 2020, the variety of energetic stations has diminished to 32 as all of the IMD stations have gone offline,” the CSE stated. The IMD’s station at Burari crossing has been offline since December final yr, whereas the Ayanagar, CRRI Mathura Street, IGI Airport, Lodhi Street, North Campus DU, and the PUSA stations went offline on March 10, it stated. In actual fact, the IMD’s two different stations — Gwal Pahari, Gurgaon, and Noida Sector 62 — have additionally gone offline, the CSE stated. An IMD official stated the Central Air pollution Management Board has been knowledgeable in regards to the challenge, and it’s more likely to be resolved subsequent week. The issue couldn’t be mounted earlier because of the COVID-19 pandemic, he stated. Of the 40 AQMs in Delhi, 24 belong to the Delhi Air pollution Management Committee, six are of the CPCB and two of the Indian Institute of Tropical Meteorology, Pune.

2021 lockdowns not as effective as last year’s in cleaning Delhi-NCR air: CSE

Lockdowns have improved the air quality in Delhi-NCR this year as well but not as effectively as last year due to the 2021 curbs being shorter and lesser stringent, the Centre for Science and Environment (CSE) has found in a study. Meteorology would be partly responsible for this trend, but it could also be a reflection of weakening of pollution control-measures and efforts in the city and region, it said. Traffic intensity was also comparatively higher in 2021, it added. This year, restrictions in Delhi started on April 6 in the form of night-curfews and weekend lockdowns with complete lockdowns being imposed on April 19. The imposition of partial-lockdown lowered PM2.5 pollutant levels by 20 per cent; while the complete lockdown brought the average down by further 12 per cent, according to the CSE analysis. “In 2020, partial lockdown started on March 12 with hard lockdown kicking in on March 25, which was lifted in phase-wise manner from May 18. Then the partial lockdown also brought PM2.5 levels down by 20 per cent, but the hard lockdown reduced it by another 35 per cent,” the CSE said. Lifting of restrictions from May 18 had led to 28 per cent rise in PM2.5 levels, it said. The green think-tank also said the lockdown summers in 2020 and 2021 have been 25 to 40 per cent cleaner as compared to the summer of 2019. It also said that spring of 2021 (January-March) has recorded the highest pollution levels for the season since 2019. Normally, PM2.5 levels have a seasonal cycle with winter being the most polluted and monsoon season being the cleanest. Spring (January to March) acts as a transitional period between the two extremes- winter and summer A significant drop in PM2.5 levels happens as the weather warms up and wind picks up speed during spring. “There was a 26 per cent drop between winter of 2018 and spring of 2019. In 2020, this drop increased to 36 per cent due to pollution control measures in place and also imposition of partial lockdowns in March 2020. But this downward trend in spring pollution did not continue this year, with seasonal drop limited to 18 per cent,” the report said. “In fact, spring this year has been 31 per cent dirtier than 2020 and 8 per cent dirtier than 2019,” it said. The CSE analysis also showed that there were 27 “very poor” days in terms of air quality this February-March compared to 17 in 2020 and 12 in 2019. Days meeting the air quality standard also plummeted this spring to just two. The year 2020 had 16 and 2019 had six days when the standard was met, it said.

All IMD Air Quality Monitoring Stations In Delhi Offline: Think Tank

None of the 8 aerial prime monitoring stations (AQMs) of the India Meteorological Department (IMD) successful Delhi has relayed information to the cardinal server successful the past 2 months, the Centre for Science and Environment said connected Friday. The IMD said the AQMs are functional but information is not being relayed to the cardinal server owed to a method issue. "Even though Delhi's monitoring web grew to 40 stations by the extremity of 2020, the fig of progressive stations has reduced to 32 arsenic each the IMD stations person gone offline," the CSE said. The IMD's presumption astatine Burari crossing has been offline since December past year, portion the Ayanagar, CRRI Mathura Road, IGI Airport, Lodhi Road, North Campus DU, and the PUSA stations went offline connected March 10, it said. In fact, the IMD's 2 different stations -- Gwal Pahari, Gurgaon, and Noida Sector 62 -- person besides gone offline, the CSE said. An IMD authoritative said the Central Pollution Control Board has been informed astir the issue, and it is apt to beryllium resolved adjacent week. The occupation could not beryllium fixed earlier owed to the COVID-19 pandemic, helium said. Of the 40 AQMs successful Delhi, 24 beryllium to the Delhi Pollution Control Committee, six are of the CPCB and 2 of the Indian Institute of Tropical Meteorology, Pune.

2021 की शुरुआत रही सबसे ज्यादा प्रदूषितः स्टडी

नई दिल्ली: 2021 के शुरुआती तीन महीने 2019 के बाद से सबसे अधिक प्रदूषित रहे हैं। यह दावा किया है सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने। सीएसई की एक रिपोर्ट के अनसुार मार्च-मई 2020 और अप्रैल-जून 2021 दोनों लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण में कमी आई। लेकिन स्प्रिंग सीजन में प्रदूषण के बढ़ने से यह साफ है कि गतिविधियों में आंशिक रोक के बावजूद प्रदूषण बढ़ रहा है। सीएसई की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रिसर्च एंड एडवोकेसी अनुमिता राय चौधरी के अनुसार महामारी की दूसरी लहर के बीच प्रदूषण कम करने के लिए एक्शन कुछ कम हो गए थे, लेकिन अब इन्हें बढ़ाने की जरूरत है। महामारी के समय में प्रदूषण के बढ़ने से लोगों को काफी परेशानियां हो सकती हैं। सीएसई की प्रोग्राम मैनेजर अविकल सोमवंशी के अनुसार इस साल जनवरी से मार्च तक पीएम 2.5 का स्तर 2019 से अब तक का सर्वाधिक रहा। सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार जनवरी से मार्च तक 2018 के मुकाबले 2019 में प्रदूषण 26 प्रतिशत कम हुआ था। 2020 में यह कमी 36 प्रतिशत की हो गई थी। वहीं मार्च 2020 में आंशिक लॉकडाउन भी इस कमी की वजह रहा। लेकिन यह ट्रेंड इस साल नहीं दर्ज हुआ। 2020 के मुकाबले शुरुआती तीन महिने इस बार 31 प्रतिशत अधिक प्रदूषित रहे। वहीं 2019 के मुकाबले यह 8 प्रतिशत प्रदूषित रहे। सीएसई के अनुसार 2021 के लॉकडाउन के दौरान में शाम के पीक आवर में एनओ-2 का स्तर 2020 के लॉकडाउन के मुकाबले 29 प्रतिशत तक अधिक रहा। लेकिन 2019 के मुकाबले यह 57 प्रतिशत तक कम रहा। वहीं मई इस साल पूरी तरह लॉकडाउन में रही। इस दौरान गाजियाबाद सबसे प्रदूषित रहा जहां औसत प्रदूषण 59 एमजीसीएम रहा। वहीं गुरुग्राम सबसे साफ 51 एमजीसीएम पर रहा। सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में फरवरी से मार्च के दौरान बेहद खराब दिनों की संख्या में मामूली इजाफा हुआ है। 2021 में इनकी संख्या 27 रही, लेकिन 2020 में यह 17 और 2019 में यह 12 थी। इस साल फरवरी मार्च में महज दो दिन प्रदूषण तय मानकों पर रहा। जबकि 2020 में ऐसे दिनों की संख्या 16 और 2019 में इनकी संख्या 6 थी।

दिल्ली-NCR में मौसम विभाग के सभी स्टेशन ऑफलाइन, सीएसई ने बताई वजह

नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। दिल्ली में मौसम विज्ञान विभाग (आइएमडी) के आठ वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों (एक्यूएमएस) में से किसी ने भी पिछले दो महीनों में केंद्रीय सर्वर को डेटा नहीं दिया है। हालांकि मौसम विभाग का कहना है कि एक्यूएमएस काम कर रहा है लेकिन तकनीकी समस्या के कारण डेटा केंद्रीय सर्वर पर नहीं भेजा जा रहा है। सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने कहा, भले ही दिल्ली का निगरानी नेटवर्क 2020 के अंत तक 40 स्टेशनों तक बढ़ गया, लेकिन सक्रिय स्टेशनों की संख्या 32 हो गई है क्योंकि मौसम विभाग के सभी स्टेशन आफलाइन हो गए हैं। बुराड़ी क्रॉसिंग पर आइएमडी का स्टेशन पिछले साल दिसंबर से आफलाइन है, जबकि आयानगर, सीआरआरआइ मथुरा रोड, आइजीआइ एयरपोर्ट, लोधी रोड, नॉर्थ कैंपस डीयू और पूसा स्टेशन 10 मार्च को आफलाइन हो गए थे। सीएसई के मुताबिक आइएमडी के दो अन्य स्टेशन ग्वाल पहाड़ी, गुरुग्राम और नोएडा सेक्टर 62 - भी आलाइन हो गए हैं। आइएमडी के एक अधिकारी ने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस मुद्दे के बारे में सूचित कर दिया गया है। अगले सप्ताह इस समस्या को हल किए जाने की संभावना है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के कारण समस्या को पहले ठीक नहीं किया जा सका। मालूम हो कि दिल्ली में 40 एक्यूएमएस में से 24 दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के हैं, छह सीपीसीबी के हैं और दो भारतीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे के हैं। दिल्ली एनसीआर की हवा को साफ करने में इस बार का लाकडाउन प्रभावी नहीं : सीएसई लाकडाउन ने इस साल भी दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता में सुधार तो किया है, लेकिन पिछले साल की तरह प्रभावी ढंग से नहीं। वजह, 2021 के प्रतिबंध छोटे और कम कड़े होना। यह सामने आया है सेंटर फार साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के एक आंकलन में। इस साल जो सुधार हुआ, उसके लिए भी मौसम का योगदान ज्यादा रहा। 2021 में यातायात की तीव्रता भी तुलनात्मक रूप से अधिक थी।