भले देर पर सही फैसला
अगर हम हर तरह के सिंगल यूज प्लास्टिक पर पाबंदी लगाना चाहते हैं तो इस सूची में चिप्स, गुटखा और शैंपू की बहुपरतीय पैकेजिंग भी शामिल करनी होगी सिंगल यूज प्लास्टिक पर 1 जुलाई से प्रभावी भारत की पाबंदी पर विचार करते हुए यह जानना जरूरी है कि हम किस चीज के खिलाफ खड़े हैं—हमारे सामने चुनौती कितनी विकट है. कोई भी जो समुद्रतट पर गया है और जिसे बोतल में संदेश मिला है, वह जानता है यह कठोर चुनौती है. बोतल प्लास्टिक से बनी है. पानी भी तकरीबन ऐसा ही है. यही संदेश है. बोतल विशाल समुद्र के मुकाबले बहुत नन्ही मालूम देती है, पर आपने कचरे के भंवरों के बारे में सुना है? सबसे बड़ा भंवर द ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच यानी प्रशांत महासागर में कूड़े-करकट का विशाल खंड करीब 16 लाख वर्ग किमी इलाके में फैला है—कैलिफोर्निया और जापान के बीच अर्ध-घुलित कचरे का तैरता हुआ पुल. हिंद महासागर में हमारा भी ऐसा ही एक कचरे का खंड है, जो दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच नीले समुद्र में जहर घोल रहा है. वैज्ञानिकों ने इसे 'महीन प्लास्टिक का सूप' कहा है.</p> पहली चीजें पहले. यह पाबंदी भारत के लिए छोटा, दरअसल बहुत छोटा, पर बेहद आगे का कदम है. अपने इस सीमित रूप में भी यह पाबंदी हमें कम से कम सोचने और आगे बढऩे को मजबूर कर सकती है. हम दैनिक उपयोग की जो चीजें एक बार इस्तेमाल करके फेंक देते हैं, यह उनकी सूची देती और रोकती है. अफसोस कि यह अधूरी सूची है, पर जिन्हें नहीं पता, उनके लिए इसमें प्लास्टिक के हल्के कप हैं जो आपको सड़क किनारे दुकानों में मिलते हैं, स्ट्रॉ जिन्हें आप ठंडे पेय खत्म करने के बाद दोबारा सोचे बगैर फेंक देते हैं—और हां, हर जगह मौजूद प्लास्टिक की थैलियां, 120 माइक्रॉन मोटाई से कम कुछ भी, दिसंबर, 2022 तक. हमारे हाथों से निकलते ही वे यहां-वहां उड़ जाती हैं, सड़कों पर प्रेतों की तरह मंडराती हैं, कचरे के पहाड़ों से मिट्टी में पहुंच जाती हैं, या नालियां बंद कर देती हैं और अंतत: हमारी नदियों में बहकर समुद्रों में चली जाती हैं—जिसे छूती हैं, उसमें जहर घोल देती हैं. समुद्रों में प्लास्टिक डालने वाली दुनिया की नदियों में गंगा छठे पायदान पर है. सिंधु दूसरे नंबर पर है. समुद्रों में उन्हें अक्सर सदियों पुराने टूथब्रश मिलते हैं, पर ज्यादातर प्लास्टिक का रूप-रंग बरकरार नहीं रहता. यह टूटता है और इसके पॉलीमर बिखर जाते हैं. यही प्लास्टिक का वह सूप है जो मछलियों के भीतर, आपके भीतर, हर चीज के भीतर पहुंच जाता है. दूसरे, हमें स्वीकार करना होगा कि उद्योग की तरफ से भविष्य के पूर्वाभास और प्रतिरोध के समूचे एहसास के बावजूद प्रतिबंधित चीजों की यह फेहरिस्त उतनी पर्याप्त व्यापक नहीं है. अगर हमारा मकसद वाकई सिंगल-यूज प्लास्टिक से निजात पाना है तो इसमें बहु-परतीय पैकेजिंग बेशक होनी ही चाहिए. यह वह सर्वव्यापी शैतान है जिसमें लिपटकर तेजी से बढ़ रही तमाम उपभोक्ता वस्तुएं—चिप्स से लेकर शैंपू और गुटके पाउच तक—हमारे पास आती हैं. गफलत में न रहें, प्लास्टिक से होने वाले दूषण के मामले में ये असली खतरा हैं. इसे इकट्ठा करना लगभग असंभव है और फिर इसे संसाधित करना बिल्कुल नामुमकिन है. बस इतना किया जा सकता है कि इसे सीमेंट संयंत्रों में भस्म कर दिया जाए, जो तकरीबन कभी होता नहीं. हमें कैसे पता? कचरों के जिन विशाल ढेरों पर इन्हें फेंक दिया जाता है, उन पर मिलने वाली प्लास्टिक की किस्म के विरले और व्यापक अध्ययन की बदौलत. इसे तब याद रखें जब आप प्लास्टिक की रंगीन पीली पन्नी के भीतर से मसालेदार आलू की कुछ फांकें निकालते हैं.</p><div id="shoppingWidget_mobile"></div> <p class="text-align-justify">करना क्या होगा? दो आसान कदम, जिनमें यूं ही इस्तेमाल किए गए गैर-विशेष प्लास्टिक के विविध रूप—जो निर्मित प्लास्टिक के तकरीबन आधे हैं—शामिल हों. सबसे पहले एक-एक प्लास्टिक की थैली और ईयरबड और चिप्स के पैकेट बीनने होंगे. दूसरे, प्लास्टिक के इन बेकार सामान को इकट्ठा करके रिसाइकल या भस्म करना होगा—किसी भी हालत में इसे कचरे के पहाड़ों या जलाशयों में नहीं जाने देना है. इन्हें भस्म भी पर्यावरण के अनुकूल तरीके से करना होगा, ताकि इसका हश्र कामगारों के लिए और ज्यादा प्रदूषण या स्वास्थ्य के खतरे पैदा करने में न हो. कोविड ने पहले ही हमारे ऊपर बहुत बोझ डाल दिया है, जिससे हमारे बीच प्लास्टिक का एक विस्फोट हो चुका है, भले ही जिसे टाला नहीं जा सकता था और जो दस्तानों से लेकर बॉडी सूट तक बचाव के पहनावों की शक्ल में सामान्य हो चुका है.</p>प्लास्टिक के कचरे को इकट्ठा करना खुले तौर पर अपने आप में मुश्किल काम है. मसलन, प्लास्टिक की थैलियों को ही लीजिए. उन पर पाबंदी नई बात नहीं. करीब 25 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश उन पर पहले ही पूर्ण पाबंदी लगा चुके हैं. मगर हम जानते हैं कि व्यवहार में क्या होता है. मोटाई को लेकर खास तौर पर चिंता है—सरकारें और नियामक आसान रास्ता अपनाते हुए कह देते हैं कि निर्णय करना और नियम लागू करना मुश्किल है. इसे पूरे प्राणपण से लागू करना हमारी सबसे बड़ी चुनौती और इस लड़ाई में जीत या हार तय करने वाला तत्व है. एक और चुनौती जिम्मेदारी तय करना है. सरकार अच्छी नीयत से शोर-शराबा करती है—2019 के स्वतंत्रता दिवस के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस आह्वान को देखिए जिसमें उन्होंने भारतीयों से ''प्लास्टिक की आदत'' छोड़ने को कहा था. अब विभिन्न पैकेजिंग सामग्री को 'उत्पादकों की बढ़ी हुई जिम्मेदारी' का हिस्सा माना जाता है, जिसमें बनाने (या खपत करने) वाली कंपनियों के लिए बेकार प्लास्टिक को इकट्ठा करके पुन: संसाधन के लिए भेजना जरूरी है. सालाना लक्ष्य हैं. घड़ी की तरह काम करना मालूम देता है... सैद्धांतिक तौर पर ही. हकीकत में बनाई या खपत की गई प्लास्टिक की मात्रा का हिसाब-किताब केवल उद्योग ही रखता है. जगजाहिर कुछ भी नहीं है जिससे हम उनकी घोषणाओं की सटीकता का आकलन कर सकें. इस तरह ईपीआर व्यवस्था खोखली है.</p> <p class="text-align-justify">इस बीच क्या हो रहा है? आधे-अधूरे समाधान जो महज सत्य छिपाने के काम आते हैं. अपने ईपीआर लक्ष्य पूरे करने के वास्ते अपनी ओर से कचरा इकट्ठा करने के लिए कंपनियां जिन एजेंसियों को ठेके देती हैं, उन्हीं में से एक के दौरे में मैंने देखा कि नगर निकायों के ट्रकों से लाए गए कचरे को कनवेयर बेल्टों पर रखा और छांटा जा रहा था. दोबारा इस्तेमाल किया जा सकने वाला सामान, एल्यूमिनियम वगैरह, वापस बाजार में जा रहा था. आखिर में उनके पास साफ-सुथरे ढंग से छांटे गए प्लास्टिक के पहाड़ जमा हो गए जो कहीं नहीं जा सकते थे—जलाने वाले सीमेंट संयंत्रों तक इन्हें ले जाना उनके लिए बहुत महंगा था. इनमें बड़ा हिस्सा बहु-परतीय पैकेजिंग और पाउचों का था.</p> बड़े कारोबार—और ज्यादातर मध्यम वर्ग—के लिए वैल्यू चेन में और नीचे अनौपचारिक क्षेत्र के लाखों लोग हैं जो प्लास्टिक के पुन: इस्तेमाल के लिए विकल्प खोज ही लेते हैं. ये हमारे कचरे के असल योद्धा हैं, जो पृथ्वी पर पड़ने वाला बोझ कम से कम टाल तो देते ही हैं. इसके आगे, रिसाइकल करने वाली 'फैक्ट्रियां' हैं, जो चार्ल्स डिकेंस के उपन्यासों सरीखी दुनिया हैं, जिसमें और ज्यादा गरीब लोग हमारे पापों का प्रायश्चित करने के लिए भयावह स्थितियों में काम करते हैं. दिल्ली के औद्योगिक इलाके बवाना में ऐसी ही एक फैक्ट्री में छांटी गई विभिन्न प्लास्टिक को टंकियों में साफ किया, उबाला, तपाया और कुंडलियों से निकाला जाता है, जब तक कि वे तार की तरह नहीं बन जाती. फिर इनके टुकड़े कर प्लास्टिक के दाने बनाए जाते हैं जो नई शक्ल लेकर पुन: आपके पास पहुंचते हैं.</p> सख्त नीति के तौर पर हम रिसाइकल की गई प्लास्टिक पर जोर देना पक्का करें. यह उस मोलभाव का एक हिस्सा है जो हमें अपने भविष्य की खातिर करना ही चाहिए. दूसरा है स्थानीय सोचना—अमीर देश अपने कचरे की गाड़ियां गरीब दक्षिण के सिर पर डालते रहे हैं और 2018 में प्लास्टिक कचरे के आयात पर चीन की पाबंदी के बाद हर कोई 'मेरे पिछवाड़े नहीं-की भावना' में जकड़ा है. भारत की प्लास्टिक के कचरे की समस्या उतनी बड़ी नहीं है जितनी पश्चिम की है, पर हम भी वहीं पहुंच रहे हैं. गोवा सरीखे समृद्ध राज्य प्रति प्रति व्यक्ति 60 ग्राम से ज्यादा उत्पन्न करते हैं; 37 ग्राम प्रति व्यक्ति के साथ दिल्ली भी तेजी से आगे आ रही है. भारत का प्रति व्यक्ति औसत, जो करीब 8 ग्राम है, निचले पायदान पर है, पर हमारी आबादी का मतलब है कि हम दुनिया के नंबर 2 उत्पादक हैं. दुनिया भर में 1950 के बाद जितनी भी प्लास्टिक का उत्पादन हुआ, उसका आधे से ज्यादा बीते करीब 12 साल में हुआ है. अब जब हम 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के इच्छुक हैं, हमें इस खतरे को खत्म करना ही होगा. लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट, नई दिल्ली की महानिदेशक हैं
