चतरा का डीएमएफ मद से खनन प्रभावित क्षेत्रों में पाइप-जलापूर्ति पर निवेश सकारात्मक, लेकिन आजीविका, स्वास्थ्य और पोषण पर भी निवेश आव्यश्यक: सीएसई आंकलन

December 07, 2018

दिसंबर , 07,2018

  • सीएसई आंकलन रिपोर्ट और चतरा जिला सूचक प्लान, डीएमएफ सम्बंधित मुख्य मुद्दों पर केंद्रित है जिसे अगले 3 से 5 वर्षों में डीएमएफ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। 
  • जिले को बच्चों के कुपोषण और मृत्यु दर के उच्च स्तर को कम करने पर ध्यान देने की आव्यश्यकता है। चतरा में 5 से कम मृत्यु दर (यू 5 एमआर) 54 है; 0-5 आयु वर्ग के लगभग 50 प्रतिशत बच्चे स्टनटेड और कम वजन वाले हैं। 
  • जिला को स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के लिए विशेष रूप से संसाधनों और स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों की कमी में सुधार के लिए निवेश करने की आव्यश्यकता है। 
  • खनन प्रभावित लोगों के लिए सतत आजीविका और सुरक्षित आय के स्रोत चिंता का विषय है। लोगों के आय और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए स्थानीय संसाधनों और कृषि में निवेश करना चाहिए। 
  • जिला पहले ही पाइप-जलापूर्ति पर निवेश करने में अग्रणी रहा है, जो खनन प्रभावित क्षेत्रों में एक प्रमुख चिंता है। अब तक, इसके लिए 250 करोड़ मंजूर किए गए हैं। जिले को उपचारित पानी पर भी ध्यान देने की आव्यश्यकता है जिससे सुरक्षित पेयजल परिवारों, आंगनवाड़ी और स्कूलों को उपलब्ध हो। 
  • जिला ने बाल पोषण और स्वास्थ्य देखभाल में सुधार के लिए सकारात्मक पहल शुरू कर दिया है। आंगनवाड़ी को सहयोग प्रदान करना और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में सुधार पर फोकस है। 

 

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई), नई दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी थिंक टैंक ने चतरा जिले के खनन प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति का विश्लेषण किया है, जिन मुद्दों को जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) के माध्यम से प्राथमिकता के साथ निवेश की आवश्यकता है। 

सीएसई रिपोर्ट आधिकारिक डेटा के मूल्यांकन के साथ-साथ टंडवा और सिमरिया ब्लॉक के खनन प्रभावित क्षेत्रों में आयोजित एक महीने के ग्राउंड सर्वे पर आधारित है। 

डीएमएफ योजना और निवेश पर रिपोर्ट और सिफारिशों को जिला प्रशासन के साथ साझा किया गया है। 7 दिसंबर, 2018 को आयोजित एक सार्वजनिक बैठक में, सबसे खनन प्रभावित ब्लॉक टंडवा में, सीएसई ने निष्कर्षों को साझा किया और डीएमएफ कार्यान्वयन पर पीआरआई सदस्यों समेत स्थानीय लोगों के साथ चर्चा की। 

चतरा डीएमएफ फंड और संभावनाएं वर्तमान में, झारखंड में डीएमएफ के तहत 3,200 करोड़ संग्रहित हैं। चतरा राज्य के प्रमुख खनन जिलों में से एक है, जहाँ पांच बड़ी कोयले की खान परियोजनाएं टंडवा ब्लॉक में स्थित हैं। जिला का मौजूदा डीएमएफ संग्रह 425 करोड़ रुपये से अधिक है।  जिला का अनुमान है कि डीएमएफ ट्रस्ट में प्रति वर्ष लगभग 150 करोड़ रुपये आएंगे । "डीएमएफ खनन प्रभावित लोगों के जीवन में सुधार करने का एक बड़ा अवसर प्रदान करता है जिससे स्वच्छ पेयजल, उचित स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा इत्यादि जैसी बुनियादी सुविधाओं को सुनिश्चित किया जा सकता हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फंड लोगों की आजीविका और आय में सुधार के लिए महत्वपूर्ण है," पीआरआई सदस्यों और खनन प्रभावित समुदायों के साथ बातचीत करते श्रेष्ठा बनर्जी, कार्यक्रम प्रबंधक, सीएसई, ने कहा। 

"चतरा वनों से समृद्ध है और इसकी कृषि क्षमता बहुत अधिक है। हालांकि, इनसे लोगों की कमाई बहुत कम है। डीएमएफ के माध्यम से लक्षित निवेश से वन उत्पादन और कृषि आधारित आजीविका की संभावना को बढाया जा सकता हैं और लोगों के ज्ञान और कौशल को बढ़ावा दे कर आय में सुधार कर सकते हैं।”– श्रेष्ठा।

 श्रेष्ठा ने कहा कि जिला पहले ही पानी के क्षेत्र निवेश करके सकारात्मक कदम उठा चुका है। खनन क्षेत्रों में पाइप-पानी की आपूर्ति के लिए 250 करोड़ रुपये निवेश किये गये है। हालांकि, आजीविका, पोषण और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दें है जिस पर जिले को साथ साथ निवेश करना चाहिए। श्रेष्ठा ने कहा, "जिला प्रशासन समस्या को पहचाना है और प्रमुख मुद्दों पर अगले 3 वर्षों में उचित नियोजित निवेश पर विचार कर रहा है।" चतरा के जिला कलेक्टर श्री जितेंद्र सिंह ने कुछ अहम पहल शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, टंडवा और सिमरिया ब्लॉक में 40 आंगनवाड़ी को अपग्रेड कर दिया गया है, और भी आंगनवाड़ी प्लान में हैं। बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल में सुधार के लिए, जिला चतरा के सभी गांवों में बुनियादी दवाएं और चिकित्सा आपूर्ति प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत एक परियोजना, आशा किट, में निवेश किया जा रहा है। यहां इस तरह के उपयोग को बेहतर बनाने के लिए डीएमएफ को टॉप अप फंड के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।  

सीएसई रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और अनुसंशायें 

1. बाल विकास और पोषण एक प्रमुख चिंता: चतरा में, शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और 5 से कम मृत्यु दर (यू 5 एमआर) क्रमशः 43 और 54 है। इसके अलावा, 5 साल से कम आयु के 50% से अधिक बच्चों स्टनटेड और कम वजन के हैं। इसके लिए तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है। जिले में आईसीडीएस समर्थन अपर्याप्त है। सीएसई के झारखंड राज्य समन्वयक राजीव रंजन ने कहा, "टंडवा और सिमरिया जैसे खनन प्रभावित क्षेत्रों में आंगनवाड़ी अपनी क्षमता से तीन गुना पर हैं।" मौजूदा एडब्ल्यूसी में स्वच्छ पेयजल और शौचालय जैसे बुनियादी सुविधाएं की भी कमी हैं। सीएसई रिपोर्ट खनन प्रभावित क्षेत्रों में मौजूदा आईसीडीएस पर जोर देती है जिससे पर्याप्त आंगनवाड़ी सुनिश्चित हो सके-पेयजल आपूर्ति और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ । जिले को नियमित और पौष्टिक खाद्य आपूर्ति भी सुनिश्चित करनी चाहिए जो बच्चों और मां उपभोग करना पसंद करते है। रंजन ने कहा, "लंबी अवधि में, जिला बीपीएल / कम आय वाले परिवारों से माताओं को सीधे लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) करने पर विचार कर सकती  है।"यह महत्वपूर्ण है कि जिले ने डीएमएफ फंडों का उपयोग करके आंगनवाड़ी को अपग्रेड करने और ऐसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी है। 

2. आवश्यक ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच: चतरा में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की स्थिति बेहद खराब है। जिले के केवल चौथाई गांवों में 5 किलोमीटर के भीतर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) है। टंडवा में, जहां अधिकांश लोग खनन से उच्च प्रदूषण के कारण विभिन्न श्वसन और अन्य बीमारियों से ग्रस्त हैं, वहां कोई पीएचसी नहीं है। टंडवा के लोगों ने कहा, "लोगों को इलाज के लिए किसे दुसरे प्रखंड या जिला मुख्यालय जाना पड़ता है।" अन्य प्रखंडों में भी पीएचसी अपर्याप्त हैं और उनकी क्षमता 4 से 5 गुना सेवा करते हैं। स्वास्थ्य उप केंद्रों के साथ भी यही स्थिति है। स्वास्थ्य कर्मियों, विशेष रूप से डॉक्टरों, नर्सों और विशेषज्ञों की उपलब्धता एक बड़ी चिंता है। उदाहरण के लिए, जिला अस्पताल में, वर्तमान में केवल 8 डॉक्टर तैनात हैं, जो आवश्यकता का केवल चौथाई हिस्सा है। सर्जन, प्रसूति विशेषज्ञ / स्त्री रोग विशेषज्ञ आदि जैसे की 37% कमी है। सीएसई रिपोर्ट अनुसंशा करती है कि पीएचसी की संख्या में वृद्धि की जानी चाहिए जिससे कम से कम भारतीय लोक स्वास्थ्य मानक (आईपीएचएस) को पूरा किया जा सके। जिला मौजूदा स्वास्थ्य उप केंद्रों को व्यापक स्वास्थ्य केंद्रों में भी अपग्रेड कर सकता है। कर्मियों को भरने के लिए प्रतिस्पर्धी वेतन के माध्यम से डॉक्टरों और प्रशिक्षित हेल्थकेयर कर्मचारियों की भर्ती की जानी चाहिए। "शुरुवात में, जिला प्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सों और तकनीशियनों से अनुबंध कर सकता है। श्रेष्ठा ने कहा,  “कर्मचारियों के घाटे को देखते हुए प्रभावित पंचायतों में डॉक्टरों की साप्ताहिक विजिट की व्यवस्था की जा सकती है।"                                      

3. सतत आय के लिए कृषि और वन संसाधनों आधारित आजीविका महत्वपूर्ण: चतरा में, कार्य आयु वर्ग (15-59 वर्ष) में से एक तिहाई लोगों के लिए रोज़गार नहीं है। यहां तक ​​कि जो लोग काम कर रहे है वो मुख्यतः मजदूर हैं, जिनका कोई नियमित आय नहीं। यह स्पष्ट रूप से दिखता है उच्च बीपीएल प्रतिशत से, जो जिला की कुल आबादी का 66% है। श्रेष्ठा कहती हैं, "खनन ने स्थानीय लोगों के आर्थिक विकास में स्पष्ट रूप से योगदान नहीं दिया है।" इसके बजाय इस क्षेत्र में प्रदूषण और जल की कमी का कारण बन गया है, जिसने क्षेत्र में कृषि उत्तपादन को कम कर दिया है। जिला की सिंचाई की स्थिति भी ठीक नहीं है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने चतरा को सबसे खराब सिंचाई वाले जिलों में से एक के रूप में पहचाना है। इसके अलावा, अधिकांश किसान के पास 1 हेक्टेयर से भी कम भूमि हैI 

डीएमएफ फंडों की संभावनाओं को देखते हुए, सीएसई पानी की उपलब्धता और मिट्टी और पानी की स्थितियों में दीर्घकालिक सुधार सुनिश्चित करने के लिए वाटरशेड प्रबंधन दृष्टिकोण की सिफारिश करती है। श्रेष्ठा बताती हैं, "जिले में पहले से ही एक वाटरशेड प्रबंधन योजना है जिसे डीएमएफ फंडों का उपयोग करके कार्यान्वित किया जा सकता है।" जिले को जैविक खेती की संभावना पर भी विचार करना चाहिए। जिला को आजीविका में सुधार के लिए वन संसाधनों की क्षमता पर भी ध्यान देने की जरूरत है। चतरा के भूमि क्षेत्र का लगभग 60% जंगल है। यहां तक ​​कि टंडवा जैसे खनन प्रभावित प्रखंड में 44% वन क्षेत्र है। जिले में कई मूल्यवान वनोपज जैसे हर्रा, बहेर्रा, महुआ, कुसुम, खजूर आदि पाए जाते हैं। 

हालांकि, स्थानीय समुदायों जो इन उत्पादों को इकट्ठा करते हैं और उन्हें स्थानीय बाजारों में बेचते हैं, उन्हें उत्पादों के सही मूल्य का बहुत कम ज्ञान है। इसके अलावा उन्हें बाजार खोजने और प्रतिस्पर्धी मूल्य पर अपने उत्पादों को बेचने के लिए सहयोग नहीं मिलता है। एमएफपी योजना के लिए सरकार का एमएसपी (लघु वन उत्पादन योजना के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य) जिला में लागू नहीं किया गया, सर्वेक्षण दिखाता है। रंजन कहते हैं, "डीएमएफ के माध्यम से उचित निवेश से, कृषि और वन आधारित आजीविका को काफी हद तक सुधार किया जा सकता है।" सीएसई रिपोर्ट ने सिफारिश की है कि लोगों को उत्पादों के बेहतर मूल्य प्राप्त करने के लिए जिला को लघुवनोपज को बाजार के साथ लिंकेज प्रदान करना चाहिए। इसके अलावा, महिला एसएचजी और प्राइमरी कोपरेटिव सोसाइटी (पीसीएस) को सामूहिक तरीके से उत्पादों को इकट्ठा करने, स्टोर करने और प्रोसेस करने और बेहतर कीमतों के लिए आवश्यक कौशल प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता दी जा सकती है। 

4. साक्षरता में सुधार और शिक्षित वर्कफोर्स को बनाने के लिए आगामी वर्षों में शिक्षा में निवेश की आवश्यकता है: चतरा की साक्षरता 60% है, जो राष्ट्रीय साक्षरता 74% से बहुत कम है। शिक्षा के स्तर में भी 33% छात्र प्राथमिक के बाद ड्रापआउट हो जाते हैं और 42% एलीमेंट्री के बाद । विश्लेषण प्राथमिक स्तर के ऊपर स्कूलों की कमी और सभी स्तरों के स्कूलों में शिक्षकों की गंभीर कमी दिखाता है। सीएसई माध्यमिक विद्यालयों की संख्या में वृद्धि और प्रतिस्पर्धी वेतन के माध्यम से कर्मियों की भर्ती की सिफारिश करता है। योग्य स्थानीय लोगों को प्राथमिक स्तर तक पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।  सीएसई रिपोर्ट आने वाले वर्षों में माध्यमिक शिक्षा के सुधार पर विशेष रूप से जोर देती है। माध्यमिक शिक्षा वाले स्कूलों की संख्या में वृद्धि की जरूरत है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि योग्य शिक्षकों हो। जिला मिडडे मील (मध्यान भोजन) योजना 10 वीं तक के बच्चों के लिए बढ़ा सकता है। ये पहल ड्रॉप-आउट कम करने और विशेष रूप से महिलाओं के बीच ख़राब पोषण स्तर को संबोधित करने में मदद करेगा। 5. स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति महत्वपूर्ण: जिला पहले ही सकारात्मक निवेश खनन प्रभावित क्षेत्रों में डीएमएफ के माध्यम से पाइप-जलापूर्ति परियोजना में कर चुका है। सीएसई अनुशंसा में कहा गया है कि पीने के पानी के लिए उपचार और शुद्धिकरण की लागत का अनुमान लगाया जाना चाहिए। श्रेष्ठा ने कहा, "चतरा को वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन के दिशानिर्देशों के अनुसार जल सुरक्षा योजना (डब्ल्यूएसपी) विकसित करने पर भी विचार करना चाहिए।"